राजनीतिक दान
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फ्सार्जेंट श्री घनश्याम दास बिड़ला, दिल्ली और कलकत्ता, सर पुरुषोत्तम
दास ठाकुर दास, बम्बई, सर लल्लू भाई सामलदास, बम्बई, डॉ. बी.आर.
अम्बेडकर, बम्बई, सेठ अम्बालाल साराभाई, अहमदाबाद, डॉ. बी.सी. राय,
कलकत्ता, लाल श्रीराम, दिल्ली, राव बहादुर एम.सी. राजा, मद्रास, डॉ. टी.एस.
एस. राजन त्रिचनापल्ली, राव बहादुर श्री निवासन, मद्रास, श्री ए.वी. ठक्कर,
महामंत्री, दिल्ली।य्
यह स्पष्ट है कि आठ सदस्यों में से तीन सदस्य अस्पृश्यों में से लिए गए थे। मेरे बोर्ड से हटने पर अन्य दो सदस्य, राय बहादुर एम.सी. राजा तथा राय बहादुर श्रीनिवासन भी उससे अलग हो गए। संघ से उनके अलग होने का क्या कारण था, मुझे मालूम नहीं।
मैंने संघ से संबंध क्यों तोड़े, इसका कारण स्पष्ट कर देना उचित होगा। पूना पैक्ट के बाद मैंने ‘भूलो और क्षमा करो’ की भावना अपनाई। मैंने बहुत से मित्रों के कहने पर श्री गांधी की सदाशयता स्वीकार कर ली। उसी भावना में मैंने संघ के केंद्रीय बोर्ड की सदस्यता स्वीकार की थी। मैं इसके जरिए कुछ करना चाहता था। वास्तव में, मैं श्री गांधी से संघ की उस योजना के विषय में चर्चा करना चाहता था। चर्चा करने से पहले तीसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन से मेरा बुलावा आ गया। मैं इतना ही कर सकता था कि मैं संघ के महामंत्री श्री ए.वी. ठक्कर को अपने विचार लिख कर भेज दूं। तदनुसार मैंने स्टीमर पर से उन्हें निम्नलिखित पत्र लिखा -
फ्एन.एन. विक्टोरिया पोर्टसईद
नवंबर 14, 1933
प्रिय श्री ठक्कर,
लंदन की यात्रा आरंभ करने से पहले मुझे आपका तार मिला, जिसमें
केंद्रीय बोर्ड के लिए राय बहादुर श्रीनिवासन तथा बम्बई प्रांतीय बोर्ड के लिए
श्री डी.बी. नाइक के नामजद करने की मेरी सलाह स्वीकार कर ली गई है।
मैं इस बात से भी प्रसन्न हूं कि इस प्रश्न को शांतिपूर्वक हल कर लिया
गया और अब हम एंटी अनटचेबिलिटी लीग ख्1, की योजना को मिल-जुलकर
चला सकते हैं। मैं सैंट्रल बोर्ड के सदस्यों से मिलकर, उनसे उन सिद्धांतों
पर चर्चा करना चाहता था, जो लीग की योजना बनाने से सम्बद्ध हैं, परंतु
- लीग को ही अंत में हरिजन सेवक संघ का नाम दिया गया।