राजनीतिक दान
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नागरिक अधिकारों की प्राप्ति तक ही सीमित रखा है। इसे कार्यान्वित करने में शासन भी प्रोत्साहन देगा।
2. अवसर की समानता
दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूं वह यह है कि लीग को दलित वर्गों को समान अवसर प्राप्त करने का कार्य अपने हाथ में ले लेना चाहिए। दलित वर्गों की गरीबी और बदहाली का मुख्य कारण अस्पृश्यता के कारण उन्हें समान अवसरों से वंचित रखना है। मुझे विश्वास है कि आप इस बात से भली भांति अवगत हैं कि दलित वर्ग के लोग अन्य लोगों की तरह गांवों में तथा शहरों में सब्जियां, दूध, घी बेचकर अपनी जीविका नहीं कमा सकते। सवर्ण हिंदू उन वस्तुओं को एक गैर-हिंदू से तो खरीद सकता है, परंतु दलित वर्ग से नहीं। नौकरियों के क्षेत्र में उसकी दशा और खराब है। सरकारी विभागों में भेदभाव का भूत मौजूद है। दलितों को पुलिस में सिपाही अथवा संदेशवाहक तक नहीं बनाया जाता। कारखानों में भी वही हाल है। अमरीका की तरह खुशहाली के दिनों में नीग्रो को सबसे अंत में नौकरी मिलेगी और मुसीबत के दिनों में सबसे पहला शिकार वही होगा। यदि वह कहीं कदम जमा कर खड़ा भी हो जाए, तो उसका भविष्य बहुत बुरा होगा। बम्बई और अहमदाबाद की सूती मिलों में उसे न्यूनतम मजदूरी ही उपलब्ध है जहां वह केवल 25 रुपए मासिक कमा सकता है। बुनाई के दरवाजे जैसे अधिक आय वाले विभाग उनके लिए हमेशा बंद रहते हैं। अल्प वेतन विभाग से भी वह तरक्की की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता। अधिकारियों के स्थान सवर्ण हिंदुओं के लिए सुरक्षित रहते हैं, जबकि दलित वर्ग के कर्मचारी कुत्तों की तरह दुम हिलाने वाले गुलाम होते हैं, चाहे वे कितने ही पुराने और कुशल क्यों न हों? उन विभागों में जहां काम के आधार पर पैसा मिलता है, उसके साथ सामाजिक भेदभाव ज्यों का त्यों है। उसे सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले ठेकेदारी के काम से वंचित रखा जाता है। अटेरन विभाग में काम करने वाली दलित वर्गों की औरतें सैंकड़ों की संख्या में शिकायत लेकर मेरे पास आइंर्। उन्होंने बताया कि वहां की नायक कच्चे माल को समस्त मजदूरों में समान रूप से बांटने की अपेक्षा सवर्ण हिंदू औरतों को ही अधिक काम देती है और उन्हें काम से प्रायः वंचित कर दिया जाता है। सवर्ण हिंदुओं के हार्थों दलित वर्गों के लोगों को सताने और विकट भेदभाव के केवल कुछ ही उदाहरण मैंने आपके सामने रखे हैं। इसलिए मैं यह उचित समझता हूं कि ऐसी असमानता