150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मुझे अफसोस है कि मैंने पत्र की सीमा का उल्लंघन किया है। मैं आगे
कोई और गलती नहीं करूंगा और इसे हनुमान की पूंछ की तरह ओर आगे
नहीं बढ़ाऊंगा। मुझे बहुत सी और भी बातें कहनी थीं, परंतु उन्हें फिर कभी
कहूंगा। पत्र समाप्त करने से पहले मुझे अभी कुछ और कहना है। बेल्फर
ने कहा था कि ब्रिटिश राज्य को कानून ने नहीं अपितु प्रेम की डोर ने ही
बांध रखा था। मैं समझता हूं ि यह बात हिंदू समाज पर भी लागू होती है।
अस्पृश्यों और सवर्णों में कानून द्वारा एकता नहीं लाई जा सकती - संयुक्त
मतदान से भी नहीं। यदि कोई बात उनमें समरसता ला सकती है, तो वह
है परस्पर प्रेम। मेरे विचार से पारिवारिक बंधन तोड़कर ही ऐसा प्रेम करना
संभव होगा और अस्पृश्यता निवारण लीग का कर्तव्य होना चाहिए कि वह
देखे कि सवर्ण अस्पृश्यों से प्रेम करते हैं और अस्पृश्यों के साथ न्याय करते
हैं अथवा नहीं। मेरे विचार से लीग के अस्तित्व अथवा उसकी योजना का
औचित्य इसी बात में निहित है।
सादर।
आपका विश्वासपात्र
(डॉ. बी.आर. अम्बेडकर)
पुनश्चयः
मैं इसे प्रकाशन हेतु प्रेस को भेज रहा हूं ताकि आम जनता भी मेरे विचारों से अवगत हो और इसे विचार करने का अवसर मिले।
सेवा में,
ए.बी. ठक्कर
महामंत्री
अस्पृश्यता निवारण लीग
बिड़ा हाउस,
नई दिल्ली