राजनीतिक दान
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IV
मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि मेरे प्रस्तावों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। यहां तक कि मेरे पत्र की पावती भी नहीं भेजी गई। मैंने यही अनुभव कि कि संघ में मेरा बने रहना लाभप्रद नहीं है। मैंने अपने को संघ से अलग कर लिया। मुझे मालूम हुआ कि मेरी अनुपस्थिति में संघ के लक्ष्य और उद्देश्यों में आमूल परिवर्तन कर दिए गए। बम्बई में 30 सितम्बर, 1932 को कावसजी जहांगीर हाल में जो बैठक हुई उसमें संस्था के उद्देश्यों को इस प्रकार बतलाया गया -
फ्अस्पृश्यता के विरोध में प्रचार करना और इसके लिए जितना व्यावहारिक हो,
इस शर्त के साथ आवश्यक कदम उठाना, कि कोई दबाव या जबरदस्ती नहीं
की जाएगी, बल्कि केवल शांतिपूर्ण ढंग से समझा-बुझाकर सभी सार्वजनिक
कुएं, धर्मशालाएं, सड़कें, पाठशालाएं, शमशान भूमि, शमशान घाट और सभी
सार्वजनिक मंदिर दलित वर्गों के लिए खुले घोषित किए जाएंगे।य्
परंतु उसके उद्घाटन के दो महीने बाद 3 नवंबर को श्री घनश्याम दास बिड़ला और श्री ए.बी. ठक्कर ने एक बयान जारी किया µ
फ्लीग को विश्वास है कि समझदार सनातनी हिंदू अस्पृश्यता निवारण के
उतना ज्यादा विरुद्ध नहीं है, जितना कि अंतर्जातीय भोज और अंतर्जातीय
विवाहों के विरुद्ध हैं। चूंकि लीग की इच्छा नहीं है कि लीग अपनी सीमा
के बाहर जाकर सुधारों को अपने हाथों में ले, इसलिए यहां पर यह भी
स्पष्ट कर देना आवश्यक हो जाता है कि लीग सवर्ण हिंदुओं के बीच में
जाकर अस्पृश्यता के अवशेष मिटाने की बातें उन्हें समझाएगी। उनके कार्य
की रूपरेखा रचनात्मक होगी_ जैसे कि दलित वर्गों का शैक्षिक, आर्थिक
और सामाजिक क्षेत्रों में उत्थान, जिससे अस्पृश्यता निवारण का स्वतः मार्ग
खुलेगा। ऐसे कार्यों से कट्टठ्ठर सनातनी हिंदू भी खींचातानी करने की अपेक्षा
उनसे सहानुभूति रखेंगे। यही वह कार्य है जिसके लिए लीग की स्थापना की
गई थी। जाति प्रथा की समाप्ति और अंतर्जातीय सहभोग, जैसे समाज सुधार
के कार्य लीग की कार्य सीमा से बाहर रखे गए हैं।य्
यहां संस्था के मूलभूत उद्देश्यों के पूर्णतया कार्य किया गया था। अब भी योजना में अस्पृश्यता निवारण को नाम मात्र के लिए स्थान दिया गया था। रचनात्मक कार्य संघ के कार्य का मुख्य अंग था। यह पूछना समीचीन होगा कि लीग के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों में से इस प्रकार का परिवर्तन क्यों किया गया? संघ के लक्ष्यों और उद्देश्यों में श्री गांधी की जानकारी में लाए बिना तथा उनकी राय के बिना कोई परिवर्तन नहीं