152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया जा सकता था। इसका कारण यही था कि संघ का मूल कार्य श्री गांधी के लिए बहुत ही असुविधाजनक था। अस्पृश्यता निवारण को मेंच ही बनाए रखना बहुत अच्छा था, परंतु जहां तक कार्यक्रम को व्यावहारिक रूप देने का संबंध है, उससे हिंदुओं के बीच में श्री गांधी की भद्द पिट जाती। ऐसी अलोकप्रियता के लिए श्री गांधी तैयार नहीं थे। इसीलिए उनके लिए रचनात्मक कार्यक्रम बेकार था। हिंदुओं ने इस कार्य पर एतराज नहीं किया। श्री गांधी ने हिंदुओं को प्रसन्न करते हुए यह काम शुरू किया। रचनात्मक कार्य के उस कार्यक्रम से अस्पृश्यों के उस स्वतंत्र आंदोलन को पलीता लगाना था, जिस आंदोलन ने 1932 में गांधी जी को पूना पैक्ट के लिए विवश किया था। इसलिए कांग्रेसियों ने लाभ समझकर रचनात्मक कार्य को ही अपने हाथ में लिया। इसके फलस्वरूप कुछ अस्पृश्य कांग्रेसी हो गए। रचनात्मक कार्य की योजना का प्रयोजन अस्पृश्यों को अपने मार्ग से हटाकर श्री गांधी मार्ग पर अग्रसर करना था, वह भी बड़े सौम्य भाव से। वास्तव में यही हुआ। हरिजन सेवक संघ अस्पृश्यों के किसी ऐसे आंदोलनों को बर्दाश्त नहीं कर सकता था जो स्वतंत्र हो और हिंदुओं तथा कांग्रेस के विरुद्ध हो। संघ उसे नष्ट करने पर आमादा हो गया। संघ के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों में ऐसे परिवर्तन के फलस्वरूप मैंने संघ से नाता तोड़ लिया।
सबसे पहले जब कुछ अस्पृश्यों ने संघ छोड़ा तो श्री गांधी ने उनके स्थान पर अन्य अस्पृश्यों को नियुक्त करने का प्रयास नहीं किया। इसके बजाए संघ का संपूर्ण प्रबंध कांग्रेस के सवर्ण हिंदुओं के हाथों में सौंप दिया गया। वास्तव में अब संघ की नीति यही हो गई है कि संघ के प्रबंध और उच्चतर निर्देशन से अस्पृश्यों को दूर रखा जाए और उन्हें संघ में न लिया जाए। अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व ख्1, जो श्री गांधी से संघ की प्रबंधक समिति में अस्पृश्यों को नियुक्त करने के अनुरोध के साथ मिला था, अस्वीकार कर दिया। उसी से उनकी भावना का पता चलता है। श्री गांधी ने प्रतिनिधियों को एक नया सिद्धांत बतला कर धीरज बंधाया। उनका कहना है फ्अस्पृश्यों के लिए कल्याणकारी कार्य करना हिंदुओं द्वारा अस्पृश्यता के पाप का प्रायश्चित करना है। जो धन एकत्र किया गया है, वह हिंदुओं के चंदे से एकत्र किया गया है। दोनों दृष्टिकोणों से हिंदुओं को ही संघ को चलाना है। नैतिकता या अधिकार से अस्पृश्य किसी सीट के लिए अपने अधिकार का औचित्य सिद्ध नहीं कर सकते हैं। श्री गांधी को इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने अपने इस उपदेश से अस्पृश्यों को कितना अपमानित किया। इससे उनके इस रूखे व्यवहार को छिपाया नहीं जा सकता। यदि श्री गांधी यही समझते हैं कि धन हिंदुओं द्वारा एकत्र किया गया है इसलिए
- अस्पृश्यों का जो प्रतिनिधित्व श्री गांधी से मिला था, वह नए पहलू का नहीं था। इससे पहले कई
प्रतिनिधिमंडल उनसे मिले थे और उनका भी वही परिणाम रहा।