6. एक झूठा दावा - Page 177

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(1) गैर-प्रादेशिक (नानटैरीटोरियल)।

(2) प्रादेशिक (टेरीटोरियल)।

  1. गैर-प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र में वे क्षेत्र आते हैं, जिनमें किसी विशेष वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया जाता है, जैसे जमींदार (लेंडलार्ड) व्यापार मंडल, श्रमिक संघ इत्यादि।

  2. प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों की तीन श्रेणियां हैं -

(1) पृथक प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र जिन्हें संक्षेप में पृथक निर्वाचन के नाम

से जाना जाता है।

(2) सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र।

(3) संयुक्त प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र जिसमें कुछ सीटें सुरक्षित हों।

  1. पृथक निर्वाचन-क्षेत्र सांप्रदायिक चुनाव क्षेत्र है। उनका उद्देश्य संप्रदाय विशेष को प्रतिनिधित्व देना होता है, जैसे कि मुसलमान, भारतीय ईसाई, यूरोपियन लोग तथा एंग्लो इंडियन। इन सभी संप्रदायों के मतदाताओं के लिए एक निर्वाचन-क्षेत्र अलग से मतदाता प्रतिनिधि के रूप में चुनते हैं और पृथक निर्वाचन का मुख्य सिद्धांत होता है कि पृथक निर्वाचन के माध्यम से केवल किसी एक समुदाय के मतदाता ही मत दे सकते हैं तथा चुनाव के लिए खड़े हो सकते हैं। यदि मुस्लिम निर्वाचन-क्षेत्र है, तो मतदाता और प्रत्याशी मुसलमान ही होना चाहिए। इसी प्रकार ईसाइयों का निर्वाचन-क्षेत्र है, तो मतदाता और प्रत्याशी ईसाई ही होना चाहिए। ऐसे में किसी विशेष समुदाय के मतदाताओं के बहुमत के आधार पर चुनाव का निर्णय किया जाता है।

  2. सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र उस निर्वाचन-क्षेत्र का साधारण रूप है, जिसमें उस क्षेत्र में रहने वाले समस्त मतदाता होते हैं, परंतु पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों से बाहर के। इसे सामान्य चुनाव कहते हैं, क्योंकि यह वह चुनाव क्षेत्र होता है जिसमें संप्रदाय और धर्म को कोई स्थान नहीं होता।

सामान्य निर्वाचन में -

(1) पृथक निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता इसमें मतदान नहीं कर सकता और

न वह प्रत्याशी के रूप में खड़ा ही हो सकता है।

(2) प्रत्येक मतदाता, जो मतदाता सूची में हैं, मतदान करने का अधिकारी

होता है और जाति अथवा संप्रदाय का उल्लेख किए बिना चुनाव में खड़ा

हो सकता है।