164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(ब) सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में से किसी संप्रदाय विशेष के लिए कोई
सीट निश्चित नहीं की जाती। परंतु संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में कम से कम
एक सीट अवश्य आरक्षित होती है।
- संयुक्त निर्वाचन पद्धति की मुख्य बातें आरक्षित सीटों वाली संयुक्त निर्वाचन पद्धति अनिवार्यतः सामान्य निर्वाचन पद्धति ही है परन्तु वह निम्नलिखित विशेषताओं के कारण भिन्न है -
(1) सामान्य निर्वाचन पद्धति में एक सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र हो सकता
है। परंतु संयुक्त निर्वाचन पद्धति में आवश्यक रूप से एक से अधिक सदस्य
होने चाहिएं।
(2) सामान्य निर्वाचन पद्धति में सभी संप्रदायों के लिए एक अथवा
एक से अधिक सीटों के चुनाव द्वारा भरे जाने के लिए दरवाजा खुला है।
सांप्रदायिक निर्वाचन की परिधि में आने वालों को छोड़कर अन्य कोई भी
चुनाव लड़ सकता है। परिणाम सांप्रदायिकता का बिना भेदभाव किए प्राप्त
मत के बहुमत के आधार पर निश्चित किया जाता है, परंतु संयुक्त निर्वाचन
में कम से कम एक सीट किसी संप्रदाय विशेष के लिए अवश्य निश्चित
रहती है। जिसका अर्थ यह है कि ऐसी सुरक्षित सीट के लिए केवल संप्रदाय
विशेष के सदस्यों में से ही प्रत्याशी खड़े हो सकते हैं।
(3) संयुक्त निर्वाचन पद्धति में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने का
अधिकार प्रतिबंधित है। परंतु सामान्य निर्वाचन पद्धति में मतदान का अधिकार
प्रतिबंधित नहीं है और समस्त मतदाता वे चाहे जिस भी संप्रदाय से संबंधित हों,
सभी लोग चुनाव में सुरक्षित सीट के लिए खड़े प्रत्याशी को वोट दे सकते हैं।
(4) सुरक्षित सीट के लिए परिणाम की घोषणा में यह आवश्यक
नहीं कि सफल उम्मीदवार को किसी संप्रदाय के मतदाताओं के मतों की
निश्चित संख्या प्राप्त करना आवश्यक हो। नियम यह है कि किसी समुदाय
का प्रत्याशी जिस सम्प्रदाय के लिए सीट आरक्षित है यदि केवल एक ही है
अथवा एक से अधिक है तो उनमें जिसके मतों की संख्या सबसे अधिक
होगी उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा चाहे दूसरा उम्मीदवार जो सामान्य
सम्प्रदाय का हो और उसने साम्प्रदायिक उम्मीदवार से अधिक संख्या में मत
क्यों न प्राप्त किए हों।
भारत में इस प्रकार की चुनाव व्यवस्था है जो चुनाव व्यवस्था अस्पृश्यों पर लागू की गई है वह संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था, जिसमें सीटों की आरक्षण की व्यवस्था होती है जैसा कि ऊपर पैरा - 7 में दर्शाया गया है। अस्पृश्यों के लिए आरक्षण के सिद्धांत