एक झूठा दावा
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को लागू करने के लिए यह किया गया है कि सामान्य चुनावों के वांछित संख्या में क्षेत्र निकाल कर वांछित संख्या के सदस्यों के क्षेत्रों में परिवर्तित कर एक अथवा दो सीटें अस्पृश्यों के लिए आरक्षित की जाएं। विभिन्न प्रांतों में इस प्रकार विभिन्न निर्वाचन पद्धतियां थीं। प्रांतीय विधान-मंडलों में अस्पृश्यों के लिए उनकी वास्तविक संख्या के अनुसार सीटें निश्चित की जाती थीं। उस योजना के मुख्य बिंदुओं पर भी ध्यान दिया जाना चिहए, जो चुनाव नतीजे की दृष्टि से निर्णायक ढंग के हैं।
संयुक्त निर्वाचन पद्धति सामान्य निर्वाचन पद्धति ही है। परन्तु इससे यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि वह निर्वाचन-क्षेत्र सामान्य मतदाताओं का ही क्षेत्र है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है, मुसलमान भारतीय ईसाई एंग्लो-इिंडयन और यूरोपियन मतदाता संयुक्त निर्वाचन से अलग कर दिए गए हैं। परिणाम यह है कि संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र वह क्षेत्र है, जिसमें वही मतदाता शामिल हैं जो अस्पृश्य जाति के हिंदू हैं, पारसी हैं तथा यहूदी हैं। जैसा कि पारसी और यहूदी केवल बम्बई को छोड़ अन्यत्र नगण्य हैं, संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र में केवल हिंदू और अस्पृश्य रह जाते हैं।
यद्यपि अस्पृश्यों के लिए एक सीट आरक्षित करने के लिए चुना गया सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र दो सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र से बड़ा हो सकता है और किसी एक सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में अस्पृश्यों के लिए एक सीट से अधिक भी आरक्षित की जा सकती है, सभी प्रांतों में सामान्य योजना यह है कि दो सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र बनाया जाए, जिसमें एक सीट हिंदुओं के लिए तथा दूसरी सीट अस्पृश्यों के लिए हो। ऐसा केवल बंगाल में है जहां तीन निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें दो सीटें अस्पृश्यों के लिए आरक्षित हैं। इस प्रकारा संयुक्त निर्वाचन सम्बद्ध निर्वाचन-क्षेत्र हैं। इस संयुक्त निर्वाचन की दो मुख्य बातें ध्यान देने योग्य हैंः (1) संयुक्त निर्वाचन में हिन्दू मतदाता अधिकतर बहुमत में होते हैं, यदि अधकि बहुमत में नहीं होते तो भी अस्पृश्य जाति के मतदाता और अल्पसंख्या में होते हैं, भले ही बहुत कम अल्पमत में हो_ और (2) आरक्षित सीट के लिए खड़े अस्पृश्य उम्मीदवार को हिन्दू मतदाता वोट दे सकता है और अस्पृश्य मतदाता हिन्दू सीट के लिए खड़े हिन्दू उम्मीदवार को वोट दे सकता है।
इस व्यवस्था में क्या संभावनाएं हो सकती हैं? क्या अस्पृश्य जातियों के मतदाता आरक्षित सीट के लिए अपने विश्वास का अस्पृश्य उम्मीदवार चुन सकते हैं अथवा क्या हिंदू लोग ऐसे अस्पृश्य उम्मीदवार को ही नहीं चुनेंगे, जो उन्हीं का पिट्ठू हो और जिसमें अस्पृश्यों का कोई विश्वास न हो। ऐसा होने की संभावनाएं दो बातों से निश्चित की जाती हैंः (1) हिंदुओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या से, (2) हिंदुओं में प्रचलित राजनीतिक संस्थानों के आधार पर। यदि केवल एक सीट है और