अनोखी घटना
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हैं। वे राष्ट्र के आधार हैं और यदि हम स्वराज के पथ पर बढ़ना चाहते हैं तो हमें इन बेडि़यों को तोड़ना ही होगा.....।य् आप एक समय में राजनीतिक प्रजातांत्रिक और सामाजिक तानाशाह दोनों नहीं हो सकते। याद रखें सामाजिक दास कभी स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता। यहां पर हम सभी ऐसा अखंड देश देखना चाहते हैं जो राजनीतिक रूप से ही नहीं वरन पूर्ण रूप से अखंड हो। अतः हम सभी ब्राह्मणों को जो उच्च वर्ग के हैं, उन दलितों के साथ गांवों में जाकर सामाजिक बुराइयों की बेडि़यों से मुक्त करना चाहिए जो देश के सामाजिक मठाधीशों से संघर्ष कर रहे हैं।य्
श्री आसफ अली के विचार थे µ
फ्दलित वर्गों की समस्या सबसे कठिन समस्या है। परंतु अब दलित वर्गों-अस्पृश्यों का उनके विरुद्ध उठने का समय आ गया है। वे मठाधीशों के निरंकुश और तानाशाही जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाते चले आ रहे हैं। ये करोड़ों बदनसीब इंसान गूंगे बनकर हजारों वर्षों से घृणित कार्य करते चले आ रहे हैं और देश की इस कू्रर परंपरा ने जिसमें समाज ने उन्हें इस दलदल में धकेला है, कभी भी निकल नहीं सकते हैं। इन मजलूमों को सदा सर्द काली रातों की मायूसी ही हाथ लगी है। यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण कू्रर त्रासदी है कि जो इन्सान अधिकार प्राप्त करने के लिए अनथक प्रयास कर रहे हों वे ही अपने आकाओं से वैध अधिकारों के विषय में भी चुप्पी साधे बैठे हैं। क्या यह उचित और न्यायसंगत है कि समाज का एक मूक वर्ग जुल्मों को सहन कर रहा है जिनके निराकरण के लिए दूसरे वर्ग अपना खून बहा रहे हैं। ऐसा क्यों? जबकि अस्पृश्य कहे जाने वोल ये लोग भी इंसान हैं, इसी हिंदुस्तान के बेटे हैं और उनकी नसों में भी वही खून दौड़ रहा है जो उन पर हुकूमत करने वालों की नसों में बह रहा है। तमाम दलित वर्ग उन सभी अधकिरों और हकों को पाने के हकदार हैं और उन्हें इन्सान के पैदायशी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अस्पृश्यों को जिस तरह हेय दृष्टि से देखा गया है। वह हिंदुस्तानियों के लिए बड़ी अपमान की बात है और अब उसका उन्मूलन होना ही चाहिए।’’
बहुत से लोग इस बात पर ताज्जुब करेंगे कि मैंने कांग्रेस के इस प्रस्ताव को, जिसे बड़ी उदात्त शैली में प्रस्तुत किया गया है और जिस वाव्Qपटुता से समर्थन