176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस तालिका से ज्ञात होता है कि जिन 151 निर्वाचन-क्षेत्रों को अस्पृश्यों के लिए आरक्षित घोषित किया जाना था उनमें 130 दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थे जिनमें एक सीट अस्पृश्यों के लिए सुरक्षित की गई तथा दूसरी सीट सामान्य रखी गई। यह बिल्कुल सम्भव है कि बहुत से लोग यह न समझ पाएं कि इस दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र पद्धति में अस्पृश्यों के लिए चुनाव संबंधी कौन सा खतरा अन्तर्ग्रस्त है। खतरा कितना वास्तविक है यह स्पष्ट हो जाएगा यदि सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में हिंदू मतों तथा अस्पृश्य मतों की सापेक्ष संख्या पर विचार किया जाए जैसा कि इस विषय में पहले ही कहा जा चुका है। जहां पर निर्वाचन-क्षेत्र बहुसदस्यीय - तीन अथवा चार सदस्यों वाला निर्वाचन-क्षेत्र हो जिनमें एक सीट अस्पृश्य के लिए आरक्षित और दो अथवा तीन सामान्य जातियों के लिए छोड़ दी गई हैं। वहां समानुपात में हिंदुओं की अधिक मत संख्या उतनी अधिक खतरनाक नहीं है, जितनी कि दो-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र में, जहां पर हिंदुओं के केवल एक सदस्य को चुनना होता है। अधिक उम्मीदवारों के चयन में हिंदुओं की मत संख्या बंट जाती है, जैसे कि वे सामान्य सीट पर अपने उम्मीदवारों के चयन की लड़ाई में व्यस्त रहते हैं और उनके पास फालतू वोट नहीं बच पाते हैं जिसके फलस्वरूप निर्वाचन-क्षेत्र में उनकी अधिक मत संख्या के कारण अस्पृश्यों के लिए अधिक अड़चन नहीं आतीं। परंतु जब उन्हें केवल एक सीट जीतनी होती है, तो उनके वोटों के बंट जाने की संभावनाएं बहुत कम हो जाती हैं। कांग्रेस जैसी संगठित पार्टी व्यवस्था के अंतर्गत तो ये संभावनाएं नगण्य हैं। बचे मतों की संख्या उनके लिए अनावश्यक हो जाती है जिसका उपयोग वे अपने उस अस्पृश्य उम्मीदवार के समर्थन में करते हैं, जो उनकी पसंद का होता है और जो उस अस्पृश्य उम्मीदवार के विरोध में कांग्रेस टिकट पर खड़ा होता है जो स्वतंत्र है और कांग्रेस का पिट्ठू बनने के लिए तैयार नहीं है। हिंदुओं ने अपने फालतू वोटों से कैसा तूफान मचाया, यह चुनावों के नतीजों से स्पष्ट है।
मतदान की पद्धति और निश्चित सीटों की संख्या पर तथा सामान्य निर्वाचन में वोटों के विभाजन पर यदि विचार करें, तो प्रतीत होता है कि अस्पृश्यों को धोखा देने की इससे अच्छी तरकीब नहीं निकाली जा सकती है। वह संयुक्त निर्वाचन पद्धति, जिससे अनुसूचित जाति के लोग उम्मीदवार बनाए जाते हैं, ऐसी सड़ी हुई खु्यिस्त्रयां हैं, जो 1832 के सुधार अधिनियम से पहले इंग्लैंड में हुआ करती थी। इसके अंतर्गत निर्वाचित उम्मीदवार वास्तव में उन प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा नामजद किया हुआ होता था, जो इन सड़ी हुई खु्यिस्त्रयों को नियंत्रित करते थे। ठीक उसी प्रकार संयुक्त निर्वाचक पद्धति के अंतर्गत, जो अस्पृश्य उम्मीदवार विधान-मंडल के लिए चुना जाता