180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आमरण अनशन पर कांग्रेसियों ने ही अमल नहीं किया। यह सदैव किसी शर्त तक ही सीमित रहा। यह वह अमोघ अस्त्र है, जिसे श्री गांधी ने अपने लिए सुरक्षित रखा हुआ है। वह भी उसे किसी विशेष परिस्थिति में चलाते हैं। ये वे चार हथियार हैं, जिन्हें कांग्रेस ने भारत की स्वतंत्रता की मांग करने में इस्तेमाल किया।
इन्हीं चारों हथियारों का यथासमय प्रयोग करते हुए कांग्रेस ने आंदोलन किए। 1920 से 1942 के मध्य देश ने देखा कि कांग्रेस ने उन्हीं हथियारों में से किसी न किसी एक का सहारा लेकर देश में प्रदर्शन किए। उन कांग्रेसियों ने जनता का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया। उसका स्वाधीनता संग्राम के नाम से वर्णन किया जाने लगा। ऐसे कार्यों से क्या लाभ हुआ? यह एक ऐसा विषय है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। परंतु उस विचार करने के लिए यहां स्थान नहीं है। यही समझना काफी है कि पुरानी कांग्रेस ने इतना खराब काम नहीं किया था। उन चारों अस्त्रों का प्रयोग वास्तव में एक दुखद घटना है। स्वराज की मांग जो कि पहले से ही की जा रही है, उसमें जनसमर्थन का असावधानी से उपयोग करने के कारण भारत के विभाजन की संभावना अधिक बननी निश्चित होने लगी तथा और नजदीक आने लगी। इस समर्थन के प्रयोग के परिणामस्वरूप क्या लाभ हुए उन पर विचार करना संभव नहीं है। परंतु तथ्य स्पष्ट होने ही चाहिए कि स्वाधीनता संग्राम का संचालन अधिकतर हिंदुओं द्वारा ही किया गया। इसमें मुसलमानों ने केवल एक बार भाग लिया था और वह भी खिलाफत आंदोलन के दौरान जो अल्पकालीन था। वे शीघ्र ही उससे अलग हो गए। दूसरे समुदायों मुख्यतया अस्पृश्यों ने कभी उस आंदोलन में भाग नहीं लिया कुछ भूले-भटके अस्पृश्य लोगों ने व्यक्तिगत स्वार्थवश उसमें हाथ बढ़ाया था, परंतु जहां तक समुदाय का प्रश्न है, वे उस आंदोलन से बाहर रहे। यह स्थिति अगस्त, 1942 में कांग्रेस द्वारा पास किए गए ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के बाद ‘स्वतंत्रता संग्राम’ के अन्तिम आन्दोलन में विशेष रूप से थी।
यह एकदम स्पष्ट तथ्य है जिसे मुख्यतया भारत आने वाला विदेशी देखता है कि आधे से अधिक जनसंख्या स्वाधीनता संग्राम में कैसे कांग्रेस के साथ असहयोग करती है। स्वभावतः वह इस स्थिति को देखकर हतप्रभ हो जाता है। वह विदेशी पूछ बैठता है - मुसलमान, ईसाई और अस्पृश्य स्वाधीनता संग्राम में भाग क्यों नहीं ले रहे हैं?य् वह कांग्रेस से इसका स्पष्टीकरण मांगता है। कांग्रेस के पास इसका उत्तर तैयार रहता है। उत्तर यह है कि अस्पृश्य ब्रिटिश साम्राज्य की कठपुतली हैं और यही कारण है कि वे स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लेते। इस लांछन की गूंज लड़ाई के दौरान बहुत से विदेशियों के मुख से सुनी गई। जो बात बहुत ही निराशाजनक अनुभव की है वह यह है कि उन विदेशियों में बहुतों ने उस लांछन को सत्य माना है। सरलता