झूठा आरोप
181
और छद्म के कारण ही ऐसे तर्क आसानी से हजम हो जाते हैं। इससे उनको दोहरी कामयाबी हाथ लगती है। एक तो इससे कांग्रेस को स्थिति को स्पष्ट करने में सहायता मिलती है और परिस्थितियों के प्रपंच को वास्तविक सा बना देती है।
यदि यह सच न होता कि महत्वपूर्ण विदेशी भी इस झांसे में आ गए हैं, तो ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण प्रचार पर कोई ध्यान न देता। स्वतंत्रता संग्राम में अस्पृश्यों ने कांग्रेस से असहयोग क्यों किया? कांग्रेस का स्पष्टीकरण वाहियात झूठा एवं आधारहीन है। केवल धूर्त ही ऐसा स्पष्टीकरण देने का साहस कर सकता है ओर बेवकूफ के सिवाए ओर कोई उसको सही नहीं मान सकता। जो घटनाएं घट रही हैं, उन पर विदेशी लोग भारत की समस्याओं के विषय में क्या सोचेंगे? मैं यही स्थिति स्पष्ट कर देना चाहता हूं और अस्पृश्यों के विषय में जो गलत धारणा बनाई गई है, उसे उनके मस्तिष्क से निकाल देना चाहता हूं। मुख्यतया इस संदर्भ में, जबकि यह सिद्ध करना आसान हो कि अस्पृश्यों पर लगाया गया यह आरोप बिल्कुल गलत है और यदि अस्पृश्यों ने फ्स्वतंत्रता संग्रामय् में भाग नहीं लिया, तो इसका कारण यह नहीं है कि वे ब्रिटिश साम्राज्य के पिट्ठू थे बल्कि कारण यह है कि उन्हें डर है कि भारत की स्वतंत्रता से हिंदू राज्य स्थापित हो जाएगा। अस्पृश्यों के लिए सभी दरवाजे बंद हो जाएंगे और सदा के लिए उनकी आशाओं, स्वतंत्रता और खुशियों के रास्ते बंद हो जाएंगे, तथा वे केवल लकड़ी चीरने वाले और पानी खींचने वाले ही बना दिए जाएंगे।
फ्स्वतंत्रता संग्रामय् में अस्पृश्यों का शामिल होने से इंकार करना स्वयं में सबूत है कि कांग्रेस से असहयोग करने का उनका कारण बचकाना नहीं हो सकता जैसा कि कांग्रेस कहती है। इसमें कुछ वास्तविकता अवश्य हो सकती है। वह क्या है? जिस कारण से अछूत कांग्रेस से असहयोग करते हैं, वह उन्होंने सामान्य रूप से यह कहकर स्पष्ट कर दिया है कि वे फ्हिंदू राजय् में विश्वास नहीं करते, जिसमें शासक वर्ग बनिया और ब्राह्मण होंगे और निम्न वर्ग के हिंदू उनके हुक्म -बरदार होंगे जो पीढ़ी दर पीढ़ी अस्पृश्यों के शत्रु रहे हैं। यह भाषा कड़वी हो सकती है, परंतु यह नहीं समझना चाहिए कि ऐसे नारे आक्रामक हैं, उनके स्वर आपत्तिजनक हैं और वह नासमझी है अथवा उनके भावों के प्रतीक मात्र हैं और उनमें किसी को विवश करने की शक्ति नहीं है और वे राजनीतिक दर्शन को सही अर्थों में प्रस्तुत नहीं कर सकते।
यदि इन्हें राजनीति शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो इन नारों का क्या अर्थ है? उनका अर्थ है कि अस्पृश्य ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति प्राप्त करने के विरुद्ध नहीं हैं परन्तु वे ब्रिटिश साम्राज्य से केवल मुक्ति प्राप्त करने में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहते। वे जोर देकर कहते हैं कि देश का स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है। स्वतंत्र भारत को