7. झूठा आरोप - Page 197

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लोकतंत्र के योग्य बनाया जाना चाहिए। इस उद्देश्य के संदर्भ में वे कहते हैं कि भारत में एक खास तरह की सामाजिक व्यवस्था होने के कारण हिंदू सांप्रदायिक बहुमत के मुकाबले में कुछ अल्पसंख्यक जातियां हैं। यदि हिंदू सांप्रदायिक बहुमत के जहरीले दांत तोड़ने के लिए भावी संविधान में प्रावधान नहीं किया जाता, तो भारत लोकतंत्र के लिए सुरक्षित नहीं रह पाएगा। इसलिए अस्पृश्य इस बात पर जोर देते हैं कि ऐसे प्रयत्न किए जाएं कि संविधान में विशेष तौर पर ऐसे संरक्षण प्रदान किए जाएं, जो भारतीय समाज में हिंदू सांप्रदायिक बहुमत को ऐसे राजनैतिक अधिकार हड़पने से रोकें, जिनके द्वारा हिंदू अस्पृश्यों को दबाते और कुचलते रहे हैं और अस्पृश्यों को कम से कम इतने राजनीतिक अधिकार दे दिए जाएं कि वे शोषण तथा हिंदुओं के अत्याचार से अपनी सुरक्षा कर सकें और अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए सांप्रदायिक बहुमत से संघर्ष कर सकें। संक्षेप में अस्पृश्य ऐसे संरक्षण चाहते हैं जिनसे वे हिंदू सांप्रदायिक बहुमत के अत्याचारों से अपनी सुरक्षा कर सकें।

दूसरी ओर कांग्रेस का चरम लक्ष्य केवल ब्रिटिश साम्राज्य से स्वाधीन हो जाना मात्र है। कांग्रेस स्वतंत्र भारत के लिए इससे और अधिक कल्याणकारी बात नहीं सोचती। जहां तक स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रश्न है, कांग्रेस इस सिरदर्द से मुक्त रहना चाहती है। जब यह पूछा जाता है कि स्वतंत्र भारत का संविधान कैसा होना चाहिए तो कांग्रेस का उत्तर होता है कि वह लोकतंत्र और वयस्क मताधिकार पर आधारित होगा। क्या वयस्क मताधिकार से बढ़कर भी संविधान में ऐसे संरक्षण दिए जाएंगे जो हिंदू सांप्रदायिक बहुमत के अत्याचारों को रोकने में सक्षम होंगे? कांग्रेस का उत्तर पूर्णतय नकारात्मक है। पूछा जाता है कि संरक्षण के विषय में ऐसा विरोध क्यों? कांग्रेस का कहना है कि ऐसा करना राष्ट्र का विघटन करना होगा। यह एक ऐसा अजीब तर्क है जिसमें अपनी बेवकूफी छिपाने की कोशिश की गई है और जो श्री गांधी के मस्तिष्क की उपज है, जिसके लिए संरक्षण के विरोधी उच्चवर्गीय हिंदू श्री गांधी के बड़े कृतज्ञ हैं।

अस्पृश्य इस प्रकार के बुद्धिहीन प्रपंच को सर्वथा अस्वीकार करते हैं। उनका कथन है कि भारतीय सामाजिक जीवन को उसके जातिवादी लक्षणों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उससे भाग खड़े होने की कोई गुंजाइश नहीं दीखती। जातियां भारतीय समाज की भयानक वास्तविकता है। जातीय प्रवृत्ति एवं प्रभाव तथा जातीय पक्षपात जातियों के बंधन को ढीले नहीं होने देते। हिंदू बहुसंख्यक समाज का सामाजिक-मनोविज्ञान उस धर्मनीति से दबा होता है, जो धार्मिक सिद्धांत केवल विषमता को ही मान्यता नहीं देता, वरन् उसमें असमानता की भी परतें बनी हुई हैं, जैसे कि वे सभी जातियों के आंतरिक संबंधों के नियामक सूत्र हों। विभिन्न परतों में ढली विषमता का धार्मिक