झूठा आरोप
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सिद्धांत स्वतंत्रता और भ्रातृत्व का पक्का शत्रु है। यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि इस प्रकार की वर्गीय विषमता कभी समाप्त होगी अथवा हिंदू सांप्रदायिक बहुमत कभी इसे तिलांजलि देने का प्रयास करेगा। इस प्रकार की परत दर परत विषमताएं आकस्मिक अथवा कभी मिटने वाली नहीं हैं। विषमताएं अटल सत्य हैं और इस बला से मुक्ति असंभव है। हिंदुओं का यही धर्म है। यह उनका मूल अधिकारिक सिद्धांत है। यह उनकी आस्था है और कोई हिंदू उसे तिलांजलि देने के लिए तैयार नहीं होगा। इसलिए हिंदुओं में परत दर परत सांप्रदायिकता बहुत फीकी नहीं पड़ सकती है। यह एक शाश्वत सत्य और अभिशाप है। भारत की संविधान रचना में रक्षा कवच की व्यवस्था कर समस्या की मौजूदा सांप्रदायिक बहुमत के रहते अनदेखी नहीं की जा सकती। यही अस्पृश्यों का तर्क है।
अस्पृश्य जिस संवैधानिक रक्षा कवच की मांग एक अरसे से करते चले आ रहे हैं, उसका उल्लेख अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ के हाल ही में पारित प्रस्ताव में किया गया है, जो परिशिष्ट ग्यारह में दिया गया है। उसमें से मैं तीन बातों का उल्लेख करना चाहता हूंः (1) विधान-मंडलों में न्यूनतम प्रतिनिधित्व की गारंटी, (2) कार्यपालिका में न्यूनतम प्रतिनिधित्व की गारंटी, (3) सरकारी सेवाओं में न्यूनतम प्रतिनिधित्व की गारंटी। स्वयं सांप्रदायिक कांग्रेस और उसके पदलोलुप अस्पृश्य प्रतिनिधियों ने इसका सांप्रदायिक कह कर मजाक उड़ा दिया है। कांग्रेस ऐसी गारंटी से मकरती है, जो राष्ट्रीयता के शिखर पर संकटमोचन बनी बैठी है। विदेशियों को संरक्षण के बारे में कांग्रेस के वाहियात तर्क समझ में आना कठिन है, परंतु यदि वे संरक्षण के तात्पर्य पर दृष्टि डालेंगे, तो वे भी उसे सांप्रदायिकता का हिस्सा और खुली बेहूदगी मान लेंगे।
अस्पृश्यों द्वारा मांगी जाने वाली इन गारंटियों का उद्देश्य है, केवल विधायिका, कार्यपालिका और प्रशासन में अस्पृश्यों को प्रतिनिधित्व दिलाना ही नहीं, वरन् ऐसी गारंटियां दिलाना है जिनका वास्तव में एक धरातल होगा और जिनके नीचे अस्पृश्य गिर कर बहुसंख्यक सांप्रदायिक हिंदुओं द्वारा कुचले नहीं जाएंगे। वे बहुसंख्यक सांप्रदायिक हिदुंओं को सीमा में रखना चाहते हैं, क्योंकि यदि अस्पृश्यों के लिए ऐसी गारंटियां नहीं मिलीं तो परिणाम यह होगा कि बहुसंख्यक सांप्रदायिक हिंदू केवल विधायिका, कार्यपालिका और प्रशासन पर ही पूरी तरह हावी नहीं हो जाएंगे वरन् राज्य के ये तीन महत्वपूर्ण अंग अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने के बजाए, बहुसंख्यक सांप्रदायिक हिंदू समाज के शस्त्र बन जाएंगे।
इस स्पष्टीकरण के प्रकाश में किसी साधारण सोच वाले विदेशी को भी कांग्रेस और अस्पृश्यों के बीच मुद्दों को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। पहली बात तो यह देखें कि इनके बीच जो मुद्दा है, वह कांग्रेस ने इस तथ्य को स्वीकार करने से