झूठा आरोप
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प्रतिक्रियावादियों से मिलकर उत्तर के बुर्जुआ लोगों ने दक्षिणी राज्यों में पुराने
गुलामों के अल्पतंत्र (होमरूल) के नाम पर क्रांति को नाम कर दिया। उस
भलमनसाहत के समझौते का अर्थ था नीग्रो लोगों के मताधिकार को समाप्त
करना, बटाईदारी हक छीनकर दैनिक मजदूर बना देना, मारपीट और नागरिक
स्वतंत्रता तथा उनके शैक्षिक अवसरों पर डाका डालना।य्
विश्वासघात का किस्सा यहीं तमाम नहीं हुआ। यहां यह भी बताना आवश्यक है कि यदि रिपब्लिकन पार्टी दक्षिण के डेमोक्रेट्स का चुनावों में सामना करते, तो नीग्रो लोग नरक यातना भोगने से बचाए जा सकते थे। क्योंकि जानने वालों का कहना है कि यदि दक्षिण में उत्तर की तरह दोनों दल बंट जाते, तो दक्षिण में कोई राज्य ऐसा नहीं जहां नीग्रो लोगों का बाहुल्य न हो। रिपब्लिकन भ्ी ऐसा न कर पाते। लगता है कि रिपब्लिकनों और डेमोक्रट की मिलीभगत थी कि नीग्रो लोगों का प्रचार न करें क्योंकि दक्षिण में रिपब्लिकन ढूंढे नहीं मिलते। वहां वे अस्तित्व में नहीं हैं। उन्हें डर था कि कहीं उन्हें नीग्रो लोगों का पक्ष न लेना पड़ जाए।
अस्पृश्य नीग्रो लोगों की गति नहीं भूल सकते। इसी दगाबाजी से बचने के लिए उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के प्रति यह रुख अपनाया। इसमें गलती क्या है? क्या वे वर्क के कथन से भी आगे है कि आधी-अधूरी सुरक्षा को छोड़कर पूरी के लिए दौड़ने से तो कायर कहलाना ही भला है।
तीसरा तर्क यह है कि कांग्रेस के इस कथन का कोई औचित्य नहीं कि पहले स्वाधीनता संग्राम लड़ा जाए और संवैधानिक संरक्षणों का मुद्दा बाद में उठाया जाए।
अस्पृश्य अनुभव करते हैं कि स्वाधीनता के लिए भारत के अधिकार के बारे में ब्रिटिश सरकार के रुख को देखते हुए, इस लड़ाई का जिससे कांग्रेस को बहुत प्यार है, कोई औचित्य नहीं है। यह तो घोड़े के आगे गाड़ी खड़ी कर देना है। स्वतंत्रता के संबंध में भारत के अधिकार के विषय में ब्रिटिश सरकार का जो रुख है वह 1857 के विद्रोह के बाद बिल्कुल बदल गया है। एक समय ऐसा था जब ब्रिटिश सरकार का कहना था कि भारत की स्वतंत्रता के अधिकार की बात तक न की जाए। ऐसी घोषणा लारेंस द्वारा की गई थी जिनकी मूर्ति कलकत्ता में लगी हुई है। उनका कहना था फ्ब्रिटिश ने भारत को तलवार की धार से जीता है और वे तलवार के बल पर ही राज करेंगे।य् अब यह दावा काफूर हो गया है और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आज प्रत्येक अंग्रेज को ऐसा कहने में लज्जा का अनुभव होता है। इस स्थिति के बाद दूसरी स्थिति आई, जिसमें भारतीय स्वतंत्रता के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि जनतंत्र प्रणाली को चलाने में भारतीय अभी सक्षम नहीं हैं। यह स्थिति