190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लॉर्ड रिपन के काल से आरंभ हुई जिसमें भारतीयों को राजनीतिक प्रशिक्षण देने का प्रयत्न किया गया। सबसे पहले स्थानीय स्वायत्त शासन के क्षेत्र में और उसके बाद मांटेग्यू चेम्सपोड सुधारों के माध्यम से प्रांतीय सरकारों में प्रशिक्षण के तौर पर अवसर प्रदान किए गए। अब हम तृतीय चरण अर्थात् वर्तमान स्थिति पर पहुंचे हैं। ब्रिटिश सरकार को अब यह कहते हुए लज्जा आती है कि वह तलवार के बल पर भारत पर शासन करेंगे। अब वह यह नहीं कहते कि भारतीय लोग जनतंत्र प्रणाली के अनुसार शासन चलाने में सक्षम नहीं हैं। ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता के लिए भारत के अधिकार को ही नहीं, वरन पूर्ण स्वाधीनता के अधिकार को भी मानने लगी है। ब्रिटिश सरकार यह भी मानने लगी है कि भारतीय अपनी मर्जी का संविधान बना सकते हैं। उनके नए दृष्टिकोण का क्रिप्स योजना से बढ़कर और कोई बड़ा सबूत नहीं हो सकता, जो ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की आबादी के संबंध में रखा गया है। पहले की शर्तें यह थीं कि भारतीयों को चाहिए कि वे ऐसे संविधान का निर्माण करें, जिसमें देश के राष्ट्रीय जीवन में सभी महत्वपूर्ण वर्गों की सहमति झलकती हो। आज हम इस स्थिति तक पहुंच चुके हैं। इसलिए अस्पृश्य नहीं समझ सकते कि कांग्रेस, भारतीयों में सहमति की प्राप्ति करने के बजाए, स्वतंत्रता संग्राम के सिद्धांत पर ही बात क्यों चलाती रहे और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल न होने के लिए अस्पृश्यों को बदनाम करती रहे।
III
कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव का विरोध क्यों करती है? कांग्रेस दो बातों पर अपने विरोध को उचित ठहराती है। कांग्रेस का कहना है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्धारित शर्त, स्वतंत्रता में अस्पृश्यों के हाथों में वीटों के समान है। यह दलील दो कारणों से बेवकूफी की है। पहला यह कि अस्पृश्यों ने कोई आसमान के तारे नहीं मांगे। यहां तक कि उन्होंने कोई बेतुकी मांग भी नहीं रखी है। उन्होंने ऐसा भी नहीं कहा जैसा कर्सन ने रेडबोण्ड से कहा था - फ्तुम्हारे संरक्षण भाड़ में जाएं, हम तुम्हारे द्वारा शासित नहीं होना चाहते।य् हिंदुओं की असामाजिक तथा अप्रजातांत्रिक नीति के बावजूद अस्पृश्य बहुसंख्यक हिंदुओं के शासन में आने को पूर्णतः स्वीकार करने को तैयार हैं। परंतु शर्त यह है कि संविधान में उन्हें न्यायोचित संरक्षण प्रदान किए जाएं। यह कहना कि अस्पृश्य असंभव मांगें पेश करके भारत की आजादी प्राप्त करने में वीटो का काम कर रहे हैं, सफेद झूठ है जिसका कोई औचित्य नहीं है। यदि कांग्रेस इस आशंका को सही मानती है, तो उसका निराकरण भी उसी के हाथ में है। क्योंकि कांग्रेस चाहे तो हिंदू और अस्पृश्यों में कोई समझौता न होने की स्थिति में यह मामला अंतर्राष्ट्रीय पंचफैसले के लिए भेज सकती है। यदि कांग्रेस इस बात पर सहमत हो,