7. झूठा आरोप - Page 206

झूठा आरोप

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तो मुझे विश्वास है कि न तो ब्रिटिश सरकार को और न अस्पृश्यों को ही इस बात पर कोई एतराज होगा। परंतु जब परस्पर समर्पित संविधान लाने के लिए ईमानदारी से सही प्रयत्न करने के बजाए कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन छेड़ने की ही बात करती है, तो इससे अस्पृश्य यही निष्कर्ष निकालते हैं कि कांग्रेस अस्पृश्यों द्वारा की गई संरक्षण की मांग पर सहमत हुए बिना ब्रिटिश सरकार को सत्ता हस्तांतरित करने के लिए विवश करना चाहती है अथवा श्री गांधी के शब्दों में, फ्कांग्रेस को चाबी सौंप देनेय् की बात कहती है। संक्षेप में कांग्रेस चाहती है कि भारत को असीमित स्वाधीनता दी जाए और हिंदू अस्पृश्यों के साथ खुले खेल खेलते रहें। यदि अस्पृश्य इस बेईमानी के खेल में उनका हाथ न बटाएं तो इसमें आश्चर्य क्या है, भले ही उस खेल को स्वाधीनता संग्राम जैसा भारी भरकम नाम ही क्यों न दे दिया गया हो?

दूसरा आधार जिस पर कांग्रेस समझौते के प्रश्न को टालने के लिए कहती है वह यह है कि ब्रिटिश सरकार ईमानदार नहीं है और ऐसी घोषणा करने पर भी ब्रिटिश सरकार सत्ता का हस्तांतरण नहीं करेगी चाहे भारतीय लोग संविधान के लिए सहमत ही क्यों न हो जाएं? अंततः इसीलिए भारतीय लोग अंग्रेज सरकार से सत्ता छीनने के लिए संघर्ष करेंगे ही। अस्पृश्यों का उत्तर है कि अंग्रेजों के वायदे पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है। आखिरकार ब्रिटिश सरकार इस देश में भारतीय लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में कार्य करती रही है और कर रही है। यदि प्रगति धीमी पड़ती है, तो इसका भी कारण यही है कि भारतीय कम कीमत पर ही संतुष्ट होना चाहते हैं। जब से अंग्रेजों ने भारत पर आधिपत्य जमाया है, तब से 1886 तक भारतीयों ने इस बात की भी परवाह नहीं की कि उन पर कौन शासन कर रहा है अथवा किस प्रकार शासन किया जा रहा है। वे इन प्रश्नों से आंदोलित हुए बिना आंख मूंदे पड़े थे। वर्ष 1886 में कांग्रेस की स्थापना हुई और वह पहला अवसर था जब से भारतीयों ने देश के शासन में दिलचस्पी लेना आरंभ किया। परंतु कांग्रेस भी वर्ष 1910 तक केवल ठीकठाक सरकार के लिए ही आंदोलन कर रही थी। 1910 में कांग्रेस ने सर्वप्रथम स्वायत्त शासन की मांग की। जब 1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार लागू हुए, तो भारतीयों के लिए स्वायत्त शासन की मांग उठाने का ध्यान आया। भारतीयों ने 1917 में 19 मांगों का ज्ञापन तैयार किया। लोग जानते होंगे कि उस समय भारतीय अधिकतर प्रांतों में दोहरी शासन प्रणाली से ही संतुष्ट थे। कुछ भारतीय नेता जैसे सर श्री दिनेश वाचा और श्री समरनाथ इसे भी भारतीयों की लंबी-लंबी छलांग मानते थे। ख्1,

  1. मांटेग्यू ने अपनी इंडियन डायरी में यह लिखा है कि जब उन नेताओं ने राजनीतिक सुधार के प्रश्न पर

मुझसे बात की, तो उन्होंने कहा, फ्सरकार पर प्रभाव डालने के प्रस्ताव पास करने का अधिकार हमें

दिया जाए, जिसे हम मृदु स्वर में सरकार के सामने प्रयोग कर सकें। परंतु हम उत्तरदायी सरकार बनाने

के योग्य नहीं हैं।य्