7. झूठा आरोप - Page 207

192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वर्ष 1930 में कांग्रेस के प्रस्तावों में पूर्ण स्वतंत्रता पर जोर दिए जाने के बावजूद गांधी जी गोलमेज सम्मेलन में केवल प्रांतीय स्वतंत्रता प्रदान कर देने से संतुष्ट हो जाने को तैयार थे। ख्1,

अस्पृश्य सोचते हैं कि वह स्थिति कब की बीत चुकी है जब ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता रूपी धन पर सांप की तरह कुंडली मारे बैठी थी और लोगों को अपने पास फटकने तक न देती थी। भारत की स्वतंत्रता उस धन के समान है जो किसी मुख्तार के कब्जे में होता है। ब्रिटिश सरकार ने अपने आपको मुख्तार बना रखा था। जैसे ही आपसी विवाद समाप्त हो जाए और भावी संविधान का स्वरूप उभर कर सामने आ जाए तभी ब्रिटिश सरकार उस धरोहर को यथोचित अधिकारी स्वामियों अर्थात् भारतीयों को सौंप दे। अस्पृश्य पूछते हैं कि इससे फायदा क्यों न उठाया जाए? देश की संपत्ति के मामले को सीधे और ईमानदारी के साथ समझौता करके क्यों न निपटाया जाए? और तब स्वतंत्रता का संयुक्त दावा क्यों न किया जाए? अस्पृश्यों का कहना है कि कांग्रेस उपरोक्त ढंग से स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ना चाहती। इसीलिए स्वतंत्रता संग्राम का कांग्रेस का नारा जालसाजी के सिवाए कुछ नहीं है, जिसका उद्देश्य अस्पृश्यों की सर्व विधा समर्थित संविधान की मांग को दरकिनार करके ब्रिटिश सरकार से स्वतंत्रता प्राप्त करना है।

अस्पृश्य यह नहीं कहते कि वे ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई घोषणा को कम करके देखना चाहते हैं, वे यह भी नहीं मानते कि यदि भारतीय समझौते पर सहमत हो जाते हैं, तो तुरंत सिम-सिम का दरवाजा खुल जाएगा या अलादीन का जादुई चिराग करिश्मा दिखा देगा। उन्हें इस बात का भी अहसास है कि ब्रिटिश सरकार अपनी घोषणा से मुकर भी कसती है। यह भी हो सकता है कि सहमति का संविधान बन भी जाए तो भी वे अपने वायदे को पूरा करें, तब स्वतंत्रता की लड़ाई आवश्यक हो जाएगी। अस्पृश्य इन संभावनाओं की उपेक्षा नहीं कर सकते। परंतु उस विषय में अस्पृश्यों का कहना है कि भारतीयों ने अंग्रेजों की अभी परीक्षा नहीं ली है। उनकी परीक्षा तब तक नहीं ली जा सकती, जब तक कि सर्व-समर्थित संविधान उनके सामने न प्रस्तुत कर दिया जाए। जब तक कांग्रेस इस दिशा में पहले कार्रवाई नहीं करती - यद्यपि यह कार्रवाई का अंतिम चरण नहीं होगा - अस्पृश्यों को अनुभव होता है कि कांग्रेस का उनके प्रति यहां तक कि देश के प्रति ईमानदारी का रवैया नहीं है। कौन कह सकता है कि अस्पृश्यों का कांग्रेस के फ्स्वतंत्रता संग्रामय् में सम्मिलित न होने का उनका तर्क न्यायोचित नहीं है।

  1. गोलमेज सम्मेलन में क्या हुआ था, यह कहानी पहले ही बतलाई जा चुकी है। परंतु जो लोग गोलमेज

सम्मेलन में उपस्थित थे, वे जानते हैं कि श्री गांधी प्रांतीय स्वायत्तता से किस प्रकार सहमत हुए थे।

यदि 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट में केंद्रीय सरकार के लिए जिन उत्तरदायित्वों तथा मौलिक

तत्वों की व्यवस्था की गई है, उसका श्रेय गैर-कांग्रेसी पार्टियों के उन प्रतिनिधियों को जाता है जिन्होंने

गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था। अंग्रेज सरकार ने उस मांग से अधिक मंजूर किया। यदि 1939 में

इस दिशा में कोई रुकावट आई, तो उसका मुख्य कारण यही था कि भारतीय इस बात पर सहमत नहीं

थे कि वे अपने देश के लिए कैसा संविधान चाहते हैं।