6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। दलित वर्ग के बच्चों को सबसे पहले सफाई से रहने की शिक्षा देने की आवश्यकता है। व्यवहार में शालीनता, प्रारम्भ में ही धार्मिक और नैतिक शिक्षा देने की आवश्यकता है। शराब तथा अन्य प्रकार की दुर्गंध और तेज गंध वाले भोज्य पदार्थों के खाने के कारण दलित वर्ग के बालकों के शरीर से पीढि़यों से दुर्गंध आती रहती है। उनका शरीर भी पीढि़यों से शुद्ध भोजन करते आ रहे तथा सफाई से रहते आए सुसंस्कृत बालकों के समान ही है। परन्तु उन दलितों के बच्चों को उनके समकक्ष लाने में पीढि़यां गुजर जाएंगी। हमें दलित वर्गों को भी उस भौतिक शुद्धता के स्तर तक लाना होगा और जब तक ऐसा नहीं किया जाता उनमें निकट संपर्क स्थापित करना अनुचित होगा। हम इसके लिए उन बच्चों तथा उनके माता-पिता को दोष नहीं देते, मैं तो केवल कटु वास्तविकता स्पष्ट कर रहा हूं। ऐसे बच्चों को स्कूल में प्रथम पाठ के तौर पर नहाना, सफाई से रहने, साफ कपड़े पहनने तथा साफ भोजन करने की शिक्षा देने की आवश्यकता हैं। दलित बच्चों की ऐसी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति स्कूलों में नहीं की जा सकती।
फ्दूसरी कठिनाई जिसका सामना दलित वर्गों के शिक्षकों को करना पड़ता है, वह संक्रामक रोगों से पीडि़त बच्चों की है। उदाहरणार्थ, आंखों की बीमारी एक संक्रामक बीमारी है। मद्रास में पंचम अर्थात् अंत्यजों से स्कूलों में शिक्षक बच्चों की आंखों की सफाई करा कर ऐसे संक्रामक रोगों की रोकथाम करते हैं। परंतु क्या उन बच्चों के माता पिता से ऐसी आशा की जा सकती है कि वे नित्यप्रति उन रोगों के संक्रमण से अपने बच्चों को बचा सकेंगे?
फ्ऐसे दुर्दशाग्रस्त बच्चों को सुपोषित बच्चों के समकक्ष लाना विडंबना ही होगी। सदाचरण सतत आत्मसंयम का फल होता है और सुपोषित बच्चे ऐसा सदाचरण मुख्यतः अपने माता-पिता तथा शिक्षकों से सीखते हैं। यदि दूसरे बच्चों के साथ बैठा कर उन बच्चों की स्कूल में आदतें न सुधारी जाएं तो उनका शीघ्र पतन होगा जैसा कि हम आए दिन देखते हैं। क्योंकि जब तक उनमें पहले से ही अच्छी आदतों का समावेश नहीं होगा उनके साथ असावधानी बरतना ठीक नहीं होगा। जिन परिवारों के बच्चों में वंशानुगत सदाचरण और विनम्रता पाई जाती है उसमें कमी नहीं आने देनी चाहिए। विनम्र भाषण, सुस्वर, सुहावने तौर-तरीकों का व्यवहार ये सब प्राचीन सभ्यता की देन हैं जिन्हें सही बंधुत्व के रूप में सुदृढ़ करना है.......।
फ्इंग्लैंड में सभी वर्गों के लड़के या लड़कियों को एक साथ शिक्षा देना कभी भी उचित नहीं समझा गया। असमान में ऐसी बेतुकी समानता