8. वास्तविक मुद्दा - Page 210

वास्तविक मुद्दा

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अस्पृश्यों का हिंदुओं से पृथक अस्तित्व होने के जो आधार अस्पृश्यों द्वारा बताए गए हैं उन्हें समझने में कोई कठिनाई नहीं है। न ही इस विषय में विस्तृत बयान देने की आवश्यकता है। उनकी समस्या का उत्तर एक साधारण प्रश्न द्वारा किया जा सकता है। अस्पृश्य किन अर्थों में हिंदू हैं? पहली बात तो यह है कि फ्हिंदूय् शब्द विभिन्न अर्थों में प्रयोग किया जाता है। परंतु इस प्रश्न को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि फ्हिंदूय् शब्द साधारणतया किन अर्थों में प्रयोग किया जाता है। कुछ लोग क्षेत्रीय अर्थ में फ्हिंदूय् शब्द का प्रयोग करते हैं। जो लोग हिंदुस्तान में रहते हैं, वे सभी हिंदू हैं। इस अर्थ में अस्पृश्य और साथ में मुसलमान, ईसाई, सिख, यहूदी और फारसी इत्यादि सभी हिंदू हुए। दूसरा और मुख्य अर्थ धार्मिक विश्वास का है। इसका कोई नतीजा निकालने से पहले यह नितांत आवश्यक है कि हिंदू धर्म के सिद्धांतों को हिंदू धर्म की उपासना पद्धति से अलग करके विचार किया जाए। क्या अस्पृश्य उस धार्मिक अर्थ में हिंदू हैं जिस पर हिंदू धर्म निर्भर करता है। यदि हिंदू धर्म का परीक्षण उसके वर्ण और अस्पृश्यता के सिद्धांतों पर किया जाए तो प्रत्येक अस्पृश्य अपने को हिंदू होने और हिंदू धर्म को स्वीकार करने से इंकार कर देगा। यदि परीक्षण धार्मिक उपासना की पद्धति पर किया जाए जैसे कि राम, कृष्ण, विष्णु और शिव तथा हिंदू धर्म द्वारा स्थापित अन्य हिंदू देवी देवताओं की उपासना, जो अस्पृश्य भी करते हैं, इस दृष्टि से वे हिंदू कहे जाते हैं क्योंकि उनकी और हिंदुओं की उपासना तथा उपास्य देवता एक हैं। कांग्रेस ने ऐसे दलाल अस्पृश्यों के संगठन बनाए हुए हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर गला फाड़ कर कहते हैं, अस्पृश्य हिंदू हैं और हिंदू रह कर मरेंगे। परंतु यही भाड़े के टट्टू यदि वे अपने आपको हिंदू होने की घोषणा करें, तो वे हिंदू नहीं माने जाएंगे, क्योंकि हिंदू धर्म का अर्थ है, वर्ण, व्यवस्था और अस्पृश्यता में विश्वास रखना।

एक विचार और है जिस पर गौर किया जाना चाहिए। अभी की गई व्याख्या के अनुसार उपासना पद्धति को सीमित अर्थों में लिया जाए, तो अस्पृश्य वर्ग हिंदू धर्म का अंग नहीं हो सकता है। यहां भी जो लोग अस्पृश्यों और हिंदुओं को समान धर्म में मानकर नतीजा निकालते हैं उन्हें चेतावनी देना भी आवश्यक है। वास्तविकता यह है कि समान उपासना करने वालों को भी एक ही धर्म का नहीं कहा जा सकता, उन्हें तो यह कहा जाएगा कि वे समान धर्म को मानते हैं। एक समान धर्म का अर्थ है लोगों द्वारा समान रूप से उस धर्म वर्ग के कृत्यों में भाग लेना। उपासना करने में भी सभी को समान रूप से सम्मिलित होने का अधिकार नहीं है। हिंदू और अस्पृश्य अलग-अलग उपासना करते हैं। उनकी उपासना पद्धति में एकरूपता होते हुए भी, वे दोनों विभिन्न मतावलंबियों के समान हैं। फ्हिंदूय् शब्द के इन दोनों अर्थों में से कोई भी अर्थ स्वयं में इस योग्य नहीं है जिससे कोई ऐसा हल निकाला जा सके, जो राजनीतिक प्रश्न को हल करने में सहायक हो।