196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि किसी परीक्षण से कोई लाभ निकल सकता है, तो वह सामाजिक अर्थ है जिससे अस्पृश्यों को हिंदू समाज का सदस्य कहा जा सकता है। क्या अस्पृश्यों को हिंदू समाज का अंग माना जा सकता है? क्या कोई ऐसा मानवीय सूत्र है जो अस्पृश्यों को शेष हिंदुओं से बांध सकता है? कोई ऐसा मानवीय बंधन नहीं है। हिंदुओं से उनका रोटी-बेटी का कोई संबंध नहीं है। उनके स्पर्श मात्र से हिन्दू अपवित्र हो जाते हैं। व्यवहार तो दूर की बात है। हिंदुओं की पूरी व्यवस्था ऐसी है, जिससे अस्पृश्यों को पृथक अस्तित्व होना सिद्ध होता है और इसी पर जोर दिया जाता है। हिंदुओं की परंपरागत परिभाषा, जिसमें हिंदू और अस्पृश्य अलग-अलग बतलाए गए हैं, अस्पृश्यों के भिन्न होने की धारणा के पक्ष में पक्का सबूत है। इस परम्परागत परिभाषा के अनुसार हिंदू फ्सवर्णय् कहलाते हैं और अस्पृश्य फ्अवर्णय् कहलाते हैं। इससे हिंदू फ्चातुर्वर्णिकय् कहलाते हैं और अस्पृश्य फ्पंचमय् कहलाते हैं। यदि इस प्रकार का अलगाव इतना महत्वपूर्ण न होता, तो उक्त परिभाषा का अस्तित्व ही नहीं होता और इस व्यवस्था का पालन करना इतना आवश्यक है, जैसे सिक्के के दो पहलू, जो एक ही सिक्के के पहलू होते हुए भी अपनी स्थिति अलग-अलग प्रकट करते हैं।
इस प्रकार कांग्रेस के इस तर्क में कोई सार नहीं है कि फ्अस्पृश्यय् हिंदू हैं और वे मुसलमानों तथा अन्य समुदायों की भांति राजनीतिक अधिकार की मांग नहीं कर सकते। जबकि परम्पराओं की दृष्टि से यह तर्क एकदम मान्य है कि अस्पृश्य हिंदू नहीं हैं। देखने में हो सकता है यह तर्क लचर लगे। इसलिए मेरे लिए कांग्रेस के इस तर्क का सामना करना आवश्यक है। मैं कांग्रेस का मुकाबला किए बिना मैदान से नहीं हटूंगा। इसी गरज से मुझे कहना है कि धर्म से अस्पृश्य हिंदू हैं। परन्तु इससे क्या फर्क पड़ता है यदि वे हिन्दू हैं। क्या उन्हें भारत के राष्ट्रीय जीवन में अलग अस्तित्व बनाए रखने से रोका जा सकता है? अस्पृश्यों को हिंदू कह देने भर से वे हिंदू समाज का अभिन्न भाग बन गए, यह मान लेना कठिन है।
हम यह तर्क मान लेते हैं कि धर्म से अस्पृश्य हिंदू हैं। क्या मेरे विचारों के अनुसार इसका अर्थ इससे और अधकि हो सकता है कि ठीक है अस्पृश्य उन सभी देवी देवताओं की पूजा करते हैं, जिनकी अन्य सभी हिंदू करते हैं, वे उन्हीं स्थानों की तीर्थ यात्रा करने जाते हैं, उन्हीं अंधविश्वासों को मानते हैं और उन्हीं पत्थरों, पेड़ों और पर्वतों को पूजते हैं जिन्हें हिंदू पूजते हैं तो क्या हिंदू होने का यही आधार है? बस, इतने पर ही दोनों को एक संप्रदाय का माना जा सकता है? यदि कांग्रेस का यही तर्क है तो बेल्जियम, डच, नार्वे, ईसाई, स्विटजरलैंड के निवासी, जर्मन निवासी, फ्रांसीसी, इटली निवासी और स्लोवाकिया के निवासी आदि के विषय में क्या सोचा जाएगा? क्या वे सभी ईसाई नहीं हैं? क्या वे सभी उसी ईश्वर की पूजा नहीं करते?