8. वास्तविक मुद्दा - Page 212

वास्तविक मुद्दा

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क्या वे सभी ईसा को अपना मुक्तिदाता नहीं मानते? क्या उन सबका धार्मिक विश्वास एक सा नहीं है? स्पष्ट है कि उन सबके विचारों, पूजा-पाठ और विश्वासों में पूर्णतया धार्मिक एकता है। तब भी इस बात पर कौन विवाद कर सकता है कि फ्रांसीसी, जर्मन और इटालियन और अन्य निवासी एक ही समुदाय के नहीं हैं? दूसरा उदाहरण लीजिए, अमेरिका में श्वेत और नीग्रो लोगों की समस्या। उनका भी एक साझा धर्म है। दोनों ईसाई हैं। क्या यह कहा जा सकता है कि धर्म के नाते दोनों एक ही समुदाय के हैं? तीसरा उदाहरण लीजिए, भारतीय ईसाइयों, यूरोपियनों, और एंग्लो-इंडियनों का। वे सभी उसी एक धर्म के मानने वाले हैं। परंतु तब भी यह माना जाता है कि उनका एक और केवल एक ईसाई समुदाय नहीं है। सिक्खों का उदाहरण लीजिए। सिख, वे सभी सिख धर्म को मानते हैं, मजहबी सिख और रामदसिया सिख अलग-अलग हैं। यह सभी मानते हैं कि उनका एक समुदाय नहीं है। इन उदाहरणों के हिसाब से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस का तर्क भ्रांतियों से परिपूर्ण है।

कांग्रेस का पहला दोष यह है कि वह यह नहीं जानना चाहती है कि समस्या को हल करने का आधारभूत कारण यह होता है कि विभाजित समाज में जनसंख्या के आधार पर संवैधानिक संरक्षण प्रदान किए जाएं अथवा नहीं। धर्म केवल वह स्थिति है जहां पर एकता अथव अलगाव का अनुमान लगाया जा सकता है। प्रतीत होता है कि कांग्रेस को यह मालूम नहीं कि मुसलमानों और भारतीय ईसाइयों को जो पृथक राजनीतिक मान्यता दी गई है वह इसलिए नहीं दी गई है कि वे मुसलमान हैं अथवा ईसाई हैं, वरन् इसलिए कि वे वास्तव में हिंदुओं से अपना पृथक अस्तित्व रखते हैं।

कांग्रेस की दूसरी गलती यह है कि वह यह साबित करने में लगी हुई है कि जहां सांझा धर्म है, वहां सामाजिक मेलमिलाप भी अवश्य होना चाहिए। इस तर्क के आधार पर ही कांग्रेस जीतने की उम्मीद रखती है। दुर्भाग्य से कांग्रेस इसमें सफल नहीं हो सकती। क्योंकि उसके तर्क के विरुद्ध काफी मजबूत अनकहे तथ्य हैं। यदि धर्म ही ऐसी परिस्थिति होता, जिससे सामाजिक एकता का तर्क दिया जाता है, तब इटेलियन, फ्रांसीसी, जर्मन और यूरोप के स्लाव, अमरीका के श्वेत लोग और नीग्रो और भारत के ईसाई यूरोपियन, एंग्लो-इंडियन केवल एक ही समाज क्यों नहीं कहलाते यद्यपि उन सबका धर्म ईसाई ही है, और हिंदू समाज के लिए ऐसा तर्क क्यों माना जाए। अफसोस की बात है कि कांग्रेस धर्म पर आधारित अपने तर्क पर इतना अधिक आसक्त है कि उसे अहसास ही नहीं होता कि इसे सहधर्मिता नहीं कह सकते। और ऐसे भी दृष्टांत हैं जहां धर्म अलग होते हुए भी उनमें अलगाव नहीं है, और ऐसे भी मामले हैं जहां सांझा धर्म होने के बावजूद अलगाव मौजूद है। परंतु अपने यहां का अलगाव बदतर है क्योंकि उस पर धर्म की मोहर लगी हुई है।