8. वास्तविक मुद्दा - Page 213

198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कांग्रेस के तर्क को काटने के लिए उन सभी मामलों का एक-एक दृष्टांत देना आवश्यक है। उनमें सबसे पहला और सरल उदाहरण सिखों और हिंदुओं का है। वे धर्म के अनुसार अलग-अलग हैं, परंतु सामाजिक रूप से अलग नहीं हैं, वे एक साथ भोजन करते हैं, आपस में विवाह संबंध करते हैं और साथ-साथ रहते हैं। किसी हिंदू परिवार में एक पुत्र सिख हो सकता है और दूसरा हिंदू। धार्मिक भिन्नता से सामाजिक संबंध नहीं टूटते। दूसरा दृष्टांत इटली निवासी, फ्रांसीसी, यूरोप में जर्मन लोग और अमरीका में गोरे और नीग्रो लोगों का है। ऐसा वहां होता है, जहां धर्म बंधन का काम करता है। परंतु धर्म उन दूसरी शक्तियों को रोकने में सक्षम नहीं होता जो जातीय भावना के विभाजन को प्रज्वलित करती है। हिंदू और हिंदू धर्म इस तीसरी बात के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं जहां धर्म ही विषमता उत्पन्न करता है।

तीसरे वर्ग में हिंदुओं का उदाहरण सर्वोपरि है, जो जुड़ने की जगह टूटने का उपदेश देता है। हिंदू का धर्म है दूर रहो, सब बातों में भिन्न रहो। कहा जाता है कि हिंदुओं में जात-पात ओर अस्पृश्यता नहीं है। यह सच्चाई पर पर्दा डालना है। हिंदू धर्म की वास्तविक भावना ही विभाजन की है। यह निर्विवाद सत्य है। जातियां और अस्पृश्यता किसलिए हैं? उत्तर स्पष्ट है - अलगाव के लिए! क्योंकि जाति अलगाव का ही दूसरा नाम है और अस्पृश्यता एक जाति से दूसरी जाति के अलगाव की चरम सीमा का परम सत्य है। यह भी निर्विवाद सत्य है कि जाति और अस्पृश्यता का सिद्धांत मृत्यु के पश्चात् आत्मा की दशा से संबंधित अन्य धार्मिक सिद्धांतों की तुलना में कम घातक सिद्धांत नहीं है। जातियां और अस्पृश्यता हिंदुओं की आचार संहिता का वह अंग हैं जिनका इस संसार में प्रत्येक िंदू को आजीवन पालन करना अनिवार्य है। जाति और अस्पृश्यता केवल सिद्धांतों से ही नहीं है, बल्कि उससे भी बहुत आगे है, वही तत्व हिंदू धर्म की आस्थाओं की सर्वोच्च श्रेणी में आता है। किसी हिंदू को केवल जातपात और अस्पृश्यता के सिद्धांत पर न केवल विश्वास करना ही काफी है, वरन् उसे अपने जीवन में जातपात और अस्पृश्यता के अनुसार आचरण करना आवश्यक है।

हिंदू धर्म द्वारा अस्पृश्यता के सिद्धांत को धार्मिक रूप देकर हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच अलगाव पैदा किया गया है। यह मात्र वैसी अलगाव की कल्पित रेखा नहीं है जैसी पुर्तगालियों और उनके शत्रुओं के बीच औपनिवेशिक अधिकार को लेकर हुए संघर्ष में पोप ने खींची थी। वह उस रंगीन रेखा के समान नहीं है, जो लंबी तो है परंतु चौड़ी नहीं और जिसे चाहे तो कोई माने न चाहे तो न माने। यह तो जातिगत

खाई है, जो विभेद करती है साम्यता नहीं लाती। इसमें गहराई और चौड़ाई दोनों हैं। वास्तव में हिंदू और अस्पृश्यों के बीच ऐसी बाढ़ लगी है, जिसमें कांटेदार तार लगे हैं। यह एक लक्ष्मण रेखा है, जिसे हिंदू लांघ नहीं सकते।