8. वास्तविक मुद्दा - Page 214

वास्तविक मुद्दा

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सामान्यतः हिंदू धर्म और सामाजिक एकता दोनों में सामंजस्य नहीं है। हिंदू धर्म में विश्वासों का आधार सामाजिक भिन्नता है, जिसका दूसरा नाम सामाजिक विभेद है और जिससे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा मिलता है। यदि हिंदू आपसी एकता लाना चाहते हैं, तो उन्हें हिंदू धर्म से नाता तोड़ना पड़ेगा। बिना हिंदू धर्म का परित्याग किए वे एकताबद्ध नहीं हो सकते। हिंदू धर्म ही एकजुटता के मार्ग में बाधक है। यह परस्पर एकता का उत्साह नहीं दिखा सकता, जो सामाजिक एकता का सूत्र है। हिंदू धर्म इसके विपरीत अलगाव की कामन करता है।

ऐसा लगता है कि कांग्रेस को यह नहीं मालूम कि उसका तर्क स्वयं उसके विरुद्ध जाता है। कांग्रेस के विचार का समर्थन करना तो दूर रहा, यह तो अस्पृश्यों के पक्ष को सही साबित करने के लिए सर्वोत्तम तथा सबसे अधिक प्रभावशाली तर्क है। क्योंकि इस काल्पनिक वास्तविकता से कि अस्पृश्य हिंदू हैं, कोई नतीजा निकाला जा सकता है तो वह यह है कि हिंदू धर्म ने सदैव सिद्धांत और व्यवहार दोनों ढंग से अस्पृश्यों को हिंदू समाज का अंग होने की मान्यता नहीं दी है और उन्हें हिंदुओं से दूर ही माना है।

यदि अस्पृश्य कहते हैं कि उनका अलग अस्तित्व है, तो उन्हें कोई भी इस बात के लिए दोषी नहीं ठहरा सकता कि उन्होंने अपने राजनीतिक लाभ के लिए नए सिद्धांत गढ़ लिए हैं। वे केवल उन तथ्यों की ओर संकेत करते हैं, जो हिंदू धर्म को विरासत में मिले हैं। कांग्रेस ईमानदारी और दृढ़ता से अस्पृश्यों के अलग अस्तित्व को मान्यता देने से इंकार करने के लिए धार्मिक सहारा नहीं ले सकती। यह तो निरा स्वार्थ है। वह जानती है कि राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों को अलग मान लेने से कार्यपालिका, विधायिका तथा सार्वजनिक सेवाओं में अस्पृश्यों और हिंदुओं की उचित भागीदारी बन जाएगी, जिससे हिंदुओं की थाली का पकवान बंट जाएगा। कांग्रेस यह नहीं चाहती कि अस्पृश्यों के हिस्से के उन अधिकारों को हड़पने से हिंदू वंचित कर दिए जाएं, जिन्हें वे अपने तक ही सीमित रखने के अभ्यस्त हैं। यही मुख्य कारण है कि कांग्रेस भारत के राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों के पृथक अस्तित्व को मानने से इंकार करती है। कांग्रेस का दूसरा तर्क यह है कि भारत के राष्ट्रीय जीवन में अस्पृश्यों के पृथक अस्तित्व को राजनीतिक मान्यता देना इस आधार पर नहीं स्वीकार किया जा सकता कि इससे अस्पृश्यों और हिंदुओं का अलगाव स्थाई हो जाएगा।

यह तर्क बालू की दीवार की तरह है। यह अपने आप में सबसे कमजोर तर्क है और इससे स्पष्ट होता है कि इससे अच्छा उत्तर कांग्रेस के पास नहीं है। अपने पहले तर्क का प्रतिवाद करने के साथ यह एकदम निराधार भी है।