8. वास्तविक मुद्दा - Page 215

200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यदि अस्पृश्यों और हिंदुओं के बीच वास्तविक भिन्नता है और यदि अस्पृश्यों को हिंदुओं से पक्षपात का खतरा है, तब अस्पृश्यों को राजनीतिक मान्यता मिलनी ही चाहिए और हिंदुओं के अत्याचारों से बचाने के लिए उनका राजनीतिक संरक्षण अनिवार्य है। बेहतर भविष्य की सम्भावना वर्तमान में हो रहे अत्याचारों से अपनी रक्षा करने से नहीं रोक सकती।

दूसरी बात यह है कि ऐसा तर्क केवल उन्हीं लोगों द्वारा दिया जा सकता है जो हिंदुओं और अस्पृश्यों की सामाजिक समरसता में विश्वास करते हैं और उनमें एकरूपता लाने के लिए सक्रिय उपाय ओर पयत्न करते हैं। अक्सर कांग्रेसियों को यह कहते हुए सुना गया है कि अस्पृश्यों की समस्या सामाजिक और राजनीतिक दोनों हैं। परंतु प्रश्न यह उठता है कि जब कांग्रेसी इसे सामाजिक कहते हैं तो क्या वे इस मामले में ईमानदार हैं? क्या वे ऐसे शब्दों का प्रयोग एक बहाने के तौर पर नहीं करते हैं, ताकि अस्पृश्यों द्वारा राजनीतिक हिस्सेदारी के अधिकारों की मांग को हवा में उड़ा दिया जाए? और यदि वे सामाजिक प्रश्नों पर ईमानदार हैं, तो उसका सबूत क्या है? क्या कांग्रेसियों ने हिंदुओं में सामाजिक सुधार लाने का कोई कार्य किया है? क्या उन्होंने रोटी-बेटी के व्यवहार के पक्ष में कोई जेहाद छेड़ा है? सामाजिक क्षेत्र में कांग्रेसियों की कथनी और करनी क्या रही है?

III

यह बता देना उचित होगा कि अस्पृश्यों के अस्पृश्यता के विषय में क्या विचार हैं। अंग्रेजों के आगमन से पहले अस्पृश्य, अस्पृश्य रहने मेंही संतुष्ट थे। अस्पृश्यों की भाग्य रेखा हिंदू ईश्वर द्वारा पहले से ही लिख दी गई थी और हिंदू शासकों द्वारा उस पर आचरण कराया जाता था। इसलिए उससे छुटकारा पाने की कोई गुंजाइश नहीं थी। भाग्यवश अथवा दुर्भाग्यवश ईस्ट इंडिया कंपनी को उनकी फौज में सिपाहियों की आवश्यकता थी और उसे अस्पृश्यों के अतिरिक्त और कोई नहीं मिला। ईस्ट इंडिया कंपनी ने आरंभ में अपनी सेना में अस्पृश्यों को रखा, यद्यपि अब अस्पृश्य लड़ाकू जातियों से बाहर कर दिए गए हैं। परंतु अंग्रेजों ने अस्पृश्यों की सेना की मदद से ही भारत को जीता था। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीय सैनिकों तथा उनके बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी। अस्पृश्यों को सेना में, जो शिक्षा मिली उससे उनको जो लाभ हुआ, वह अभूतपूर्व था। इससे उन्हें नई दिशा और नई दृष्टि मिली। उनमें चेतना जगी कि उनकी दुर्दशा उनके माथे की लकीर नहीं है। वह मक्कारों की करतूत है और वह एक कलंक का टीका है। इससे उन्हें बड़ी लज्जा का अनुभव हुआ।