8. वास्तविक मुद्दा - Page 217

202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहा जाता है, से नितांत भिन्न है। मूलतः यह बिल्कुल भिन्न समस्या है। यह समस्या दरअसल अल्पसंख्यकों को उन बहुसंख्यकों के चंगुल से निकालने से संबंधित है जो किसी षड्यंत्र के तहत उनको समानता और स्वतंत्रता का अधिकार देने से मुकरते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में अस्पृश्यों की समस्या मूलतः राजनीतिक समस्या है। अगर यह तर्क मान भी लिया जाए कि यह एक सामाजिक समस्या है तब भी यह समझना कठिन है कि अस्पृश्यों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक संरक्षण और राजनीतिक मान्यता देने के कारण हिंदुओं के साथ सामाजिक एकीकरण करने में क्या दिक्कत पेश आ रही है? ऐसे तर्क देते समय अपने कांग्रेसी लोग कुतर्क करने लगते हैं। वे राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों के अंतर्संबंधों से दो चार हुए नहीं प्रतीत होते। इसका स्पष्ट उदाहरण कांग्रेस द्वारा पृथक चुनाव का विरोध करने और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को प्रथमिकता देने में मिलता है। उनके तर्कों का ढंग विचारणीय है। संयुक्त निर्वाचन में हिंदू अस्पृश्य को वोट देंगे, अस्पृश्य हिंदू को। इससे सामाजिक एकता मजबूत होती है। पृथक निर्वाचन प्रणाली में हिंदू लोग हिंदू उम्मीदवार को तथा अस्पृश्य मतदाता अस्पृश्य उम्मीदवार को वोट देंगे, तो इससे सामाजिक एकता ढह जाएगी। यह ऐसा दृष्टिकोण नहीं है, जिसकी ओर अस्पृश्य लोग चुनाव के दृष्टिकोण देखते हैं। उनकी चिंता यह है कि दोनों प्रकार के चुनावों में कौन ऐसा है, जिसके द्वारा अस्पृश्य अपनी पसंद का प्रतिनिधि चुन सकते हैं। परंतु मैं कांग्रेस के तर्क की परीक्षा करना चाहूंगा। मैं अपने परीक्षण को लंबा खींचकर तर्क को उलझाना नहीं चाहता हूं। कांग्रेस का तर्क सही प्रतीत होता है, परंतु यह फालतू की बात है। ये चुनाव पांच साल में एक बार होते हैं। यह पूछना युक्तिसंगत है कि अस्पृश्यों और हिंदुओं में पांच साल में केवल एक दिन के संयुक्त मतदान से सामाजिक एकता कैसे लाई जा सकती है, जबकि ये अस्पृश्य उन हिंदुओं से अलग दयनीय जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार यह भी पूछा जा सकता है कि पांच साल में केवल एक दिन पृथक निर्वाचन में वोट देकर कौन-सा बड़ा बदलाव आ जाएगा। अथवा पांच साल में केवल एक दिन में अलग वोट देने से जो लोग दोनों वर्गों में एकता का कार्य कर रहे हैं, उन्हें क्या कठिनाई होगी? उस एकता को सुदृढ़ करने के लिए अस्पृश्यों के साथ पृथक निर्वाचन से रोटी-बेटी के व्यवहार पर क्यों आंच आती है? केवल घोर मूर्ख ही कहेगा कि आंच आएगी। इसलिए यह कहना बचकानापन है कि अस्पृश्यों के पृथक अस्तित्व को राजनीतिक मान्यता देना और उनकी संवैधानिक संरक्षणों की मांग स्वीकार करना, उनमें अलगाव को गहरा कर देना है, यदि हिंदू उसे समाप्त करना चाहें तो भी नहीं कर सकेंगे।