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वास्तविक मुद्दा

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IV

राजनीतिक अधिकारों के लिए अस्पृश्यों के दावों को लेकर कुछ और भी तर्क हैं जिनकी समीक्षा करना आवश्यक है। इन तर्कों में से एक केवल भारत में ही नहीं यूरोप में भी है परंतु यूरोप में संविधान रचना के समय उनका कोई नाम नहीं लिया गया। भारत में ही उन्हें क्यों गिना जाता है। सिद्धांत साधारण हैं, परंतु इसी बात पर इतना व्यापक विचार किया जाना चाहिए कि अस्पृश्यों का दावा भी उसी में समा जाए। मेरा विचार है कि वैसे इस बात में कोई दम नहीं है।

मैं अपनी टिप्पणी में कथन और तर्कों का अलग से जिक्र करूंगा। बात सटीक है। कहा जाता है कि हर समाज में समुदय होते हैं, इस कथन को चुनौती नहीं दी जा सकती। इसलिए यूरोप और अमरीकी समाज में भी विभिन्न प्रकार के भिन्न-भिन्न समुदाय हैं। कुछ रिश्ते-नातों से बंधे हैं जिनमें रक्त और भाषा की समानता है। कुछ एक सामाजिक हैसियत और रुतबों पर आधारित हैं। कुछ धार्मिक संघ हैं, जिनकी कुछ आस्थाएं हैं। राजनीतिक दलों, औद्योगिक निगमों, अपराधी गिरोहों का तो कुछ कहना ही नहीं। उनमें कुछ ढीले-ढाले हैं और कुछ भाईचारे से बंधे हैं। परंतु जब यह कथन आगे बढ़ता है और कहा जाता है कि भारत की जातियां यूरोपीय और अमरीकी समुदायों से भिन्न नहीं हैं, तो यह बकवास है। देखने में यूरोप के ये वर्ग और समुदाय भारत की जाति प्रथा के समान लगते हैं। किंतु मौलिक रूप से दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। पहचान का प्रमुख लक्षण बहिष्कार और छांट कर अलग कर देना है, जो जातिवादी भारत की जीवन-शैली है। यह दैनिक क्रिया ही नहीं, बल्कि आस्था है, जो यूरोप और अमरीका में दुर्लभ है।

भारत की सामाजिक व्यवस्था पर विचार करने से ज्ञात होता है कि यहां की सामाजिक व्यवस्था यूरोप और अमरीका की व्यवस्था से बिल्कुल भिन्न है। यूरोप और अमरीका में संविधान का निर्माण करते समय सामाजिक व्यवस्था और उसकी परिस्थितियों को ध्यान में रखने की आवश्यकता नहीं पड़ी। परंतु भारत में संविधान का निर्माण करते समय जाति और अस्पृश्यता की समस्या की उपेक्षा नहीं की जा सकती। मुझे यह स्पष्ट करना है कि यूरोप में ऐसी आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी? केवल भारत में ही क्यों जरूरी है? जो समाज समुदायों में बंटा रहता है, उसके लिए केवल यही

खतरा है कि उसमें प्रत्येक समुदाय केवल अपनी उन्नति की फिक्र करता है और गु्रप अपने हितों को देखता है। संवैधानिक सुरक्षा की तब आवश्यकता पड़ती है जब कोई वर्ग शरारतन दूसरे के विरुद्ध काम करता है। गैर-राजनीतिक हथकंडों के खिलाफ संवैधानिक संरक्षणों की आवश्यकता नहीं पड़ती। परंतु यदि हानि पहुंचाने वाले गैर-राजनीतिक साधन नहीं हैं, तब संवैधानिक संरक्षणों का अवश्य प्रावधान होना चाहिए।