8. वास्तविक मुद्दा - Page 219

204 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यूरोप में भी अपने हितसाधन के लिए दूसरे को नीचा दिखाने की घटनाएं होती हैं। परंतु इसमें अंतर यह है कि वहां विभिन्न समूहों में अलगाव का चलन नहीं है जिससे उनमें आपसी बातचीत की गुंजाइश होती है। परिणाम यह निकलता है कि वह समुदाय अपने हितों की रक्षा के लिए अपने प्रयत्न बढ़ा सकता है। यूरोप के समुदायों में यह बीज तत्व भिन्न है, जो ऐसे समाज का स्वरूप है, जो लक्ष्यों में विचारशीलता, सहिष्णुता और एकता पर आधारित है। परंतु भारत में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। यहां पर जातपांत ही विभेद और पृथकता की जननी है। इससे विभिन्न जातियों में परस्पर संवादहीनता है। विभिन्न जातियां या जाति समूह खुदगर्ज हैं और अन्य उनकी आंख की किरकिरी के समान हैं। वे सदा अपने को परम पवित्र मानती हैं। इसलिए सहभोज दुर्लभ है। उनमें भावात्मक या बौद्धिक प्रेरणा नहीं होती। सहयोग भी होता है, तो रूढि़गत ही रहता है। उनकी प्रवृत्ति में कोई परिवर्तन नहीं आता। इसलिए आपाधापी के इस माहौल में निरुत्साहित जातियों की रक्षा के लिए संवैधानिक संरक्षण नितांत आवश्यक है।

हमारे यहां जातपांत की अपनी अलग ही विशिष्ट प्रवृत्ति है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में इस प्रकार की व्यवस्था की जाए कि इस प्रवृत्ति से निपटा जा सके। समुदाय तो प्रत्येक समाज में होते हैं, परंतु उनमें समानता चाहिए। अन्य स्थानों पर इन समुदायों के परस्पर संबंध वैसे नहीं हैं। किसी समाज में ऐसे समुदाय हो सकते हैं, जो सामाजिकता के प्रति उदासीन हों, परंतु उनमें कुछ समाज विरोधी भी हो सकते हैं। जहां वे सामाजिक उदासीनता रखते हैं, वहां संविधान बनाते समय उन पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। सामाजिकता हीन समुदाय से कोई भय नहीं होता। परंतु जहां एक दूसरे के प्रति सामाजिक विरोधी भावनाएं पनप गई हों, जो समरूपता की शत्रु हों वहां संविधान रचना के समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए और जो वर्ग समाज विरोधी तत्वों का शिकार हो उसे समुचित संरक्षण दिया जाना चाहिए। हिंदू समाज अस्पृश्यों के प्रति कितना समाज विरोधी है, इसके लिए कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं। उदाहरण के लिए हिंदू अस्पृश्यों को कुएं से पानी नहीं भरने देते। हिंदू अस्पृश्यों को बस में सफर नहीं करने देते। अपने साथ हिंदू अस्पृश्यों को रेलवे में एक डिब्बे में सफर नहीं करने देते। हिंदू अस्पृश्यों को स्कूलों में प्रवेश नहीं करने देते। हिंदू अस्पृश्यों को गहने जेवर नहीं पहनने देते। हिंदू अस्पृश्यों को अपने घरों की छतें खपरैल से नहीं बनाने देते। हिंदू अस्पृश्यों को जमीन के मालिक के रूप में देखना बरदाश्त नहीं करते। हिंदू अस्पृश्यों को जानवर नहीं पालने देते। हिंदू यह नहीं बरदाश्त करते कि अस्पृश्य उनके सामने चारपाई पर बैठा रहे। हिंदुओं में यह मुट्टòी भर लोगों का ही दर्प नहीं है, वरन् अस्पृश्यों के प्रति हिंदू जाति की समाज विरोधी भावनाओं के उद्गम हैं। ख्1,

  1. विस्तृत जानकारी के लिए मेरी पुस्तक देखें फ्व्हाट द हिंदूज हैव डन टू असय्।