वास्तविक मुद्दा
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मामले को आगे बढ़ाना अनावश्यक होगा। यही कहना काफी है कि हिंदुओं का शास्त्र गप्पों से भरा हुआ है। यदि इसका प्रयोग अस्पृश्यों के संवैधानिक संरक्षणों की मांग का विरोध करने का आधार बनाया जाता है, तो यह कुतर्कों का शर्मनाक नमूना है।
V
एक और तर्क पेश किया जाता है जिसका आधार यह है कि अस्पृश्यता तो कुछ दिनों की मेहमान है। यह शाश्वत सत्य है कि सभी वस्तुएं मिटने वाली हैं, इसलिए उनके प्रति संरक्षणों की जरूरत नहीं है। जीवन में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि जब तक यह स्थिति नहीं आती, तब तक तो इंतजाम किया जाए। समाज-वृक्ष की डाल-डाल, पात-पात पर अस्पृश्यता विद्यमान है। हम सभी को आशा करनी चिहए कि अस्पृश्यता से मुक्ति मिले, परंतु हमें उन लोगों के छलावे से सावधान रहना है, जो असाध्य आशावादी होने का दम भरते हैं। आशावादियों द्वारा मायूसों की हिम्मत बढ़ाना अच्छी बात है, पर सब्जबाग में कुछ सच्चाई तो हो।
यह तर्क कोई तर्क नहीं है। परंतु कुछ लोग इस ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसलिए मैं उसकी पोल खोलना चाहता हूं कि ऐसा तर्क कितना थोथा है। जो लोग इस प्रकार के तर्क देते हैं वे अस्पृश्यता की छुई मुई और दूसरे उसकी मानसिक धारणा के सामाजिक पक्ष में विभेद करते नहीं प्रतीत होते। उपरोक्त दोनों प्रकार की अस्पृश्यता में काफी अंतर है। ऐसा हो सकता है कि अस्पृश्यता को लेकर छुई-मुई धारणा की नगरों में धीरे-धीरे मिट रही हो, यद्यपि इसमें संदेह है कि इतनी अधिक तेजी से अस्पृश्यता मिट रही है। परंतु मुझे विश्वास है कि अस्पृश्यता जैसी कि हिंदुओं की प्रवृत्ति है, अस्पृश्यों से भेदभाव करना - अस्पृश्यता नगरों अथवा गांवों में कल्पनातीत समय में नहीं मिट पाएगी। अस्पृश्यता की केवल भेदभावमूलक प्रवृत्ति के तौर पर नहीं मिट पाएगी, वरन् अस्पृश्यता फ्मुझे मत छुओय् की धारणा निश्चित समय में उन गांवों में समाप्त नहीं होगी, जहां हिंदू बड़ी संख्या में रहते हैं और जो अस्पृश्यता को कायम रखने में विश्वास करते हैं। जिस मनुष्य के मस्तिष्क में दो हजार वर्षों से, जो भावना घर कर गई है, उसे विपरीत दिशा में नहीं मोड़ा जा सकता।
मुझे अच्छी तरह से पता है कि हिंदू धर्म में कुछ ऐसे दिग्गज हैं जिनका कहना है कि हिंदू धर्म बहुत ही लचीला है, यह प्रत्येक बाह्य तत्व के साथ तालमेल बिठा सकता है और उसे अपने में आत्मसात कर लेता है। मैं नहीं समझता कि धर्म की ऐसी क्षमता को कोई गुण मानकर उस पर गर्व करेगा। मैं ऐसी बचकाना बातों को महत्व नहीं देता कि कोई गोबर खाकर उसे पचा ले। परंतु वह अलग बात है। यह बिल्कुल सत्य