8. वास्तविक मुद्दा - Page 221

206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है कि हिंदू धर्म अपने आप में कई बातें आत्मसात कर सकता है। इसके आत्मसात करने का सबसे अच्छा उदाहरण है, साहित्यिक कृति फ्अल्लाहुपनिषदय् जिसे अकबर के शासन-काल के ब्राह्मणों ने अकबर के दीन इलाही (दीनइलाही) को हवा देने के लिए तैयार किया था और उसे हिन्दू धर्म के सप्तम दर्शन की मान्यता दी थी। यह सत्य है कि हिंदू धर्म अपने में बहुत-सी बातें आत्मसात कर सकता है। गोमांस भक्षण करने वालों (हिंदू धर्म) ने बौद्ध धर्म के अहिंसावादी सिद्धांत को अपने में आत्मसात कर लिया और पूर्ण शाकाहारी धर्म बन गया। यही हिन्दू धर्म आदिकाल में ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना जाता था। परंतु हिंदू धर्म एक बात जो कभी नहीं कर सका वह यह है कि वह अस्पृश्यों को आत्मसात नहीं कर सका अथवा अस्पृश्यता की खाई को नहीं पाट सका। श्री गांधी से पहले बहुत से सुधारक हुए, जिन्होंने अस्पृश्यता को मिटाने के प्रयत्न किए। परंतु सभी सुधारक ढाक के तीन पात ही साबित हुए। मेरे विचार से उनकी असफलता का कारण बहुत मामूली था। हिंदुओं को अस्पृश्यों से कोई डरने की बात नहीं थी और अस्पृश्यता निवारण से उन हिंदुओं को कोई लाभ नहीं होने वाला था। हिंदुओं ने अल्लाहुपनिषद लिखा, क्योंकि अकबर द्वारा नए धर्म की स्थापनोस अकबर की सहायता का लालच था। उन्हें सब कुछ मिल सकता था, फ्अल्लाहुपनिषदय् के लेखक ने सम्राट को प्रसन्न कर धनराशि प्राप्त की और नए धर्म दीनेइलाही की स्थापना में सम्राट की सहायता की, जिससे पहले कि अपेक्षा इस्लाम द्वारा हिंदुओं के उत्पीड़न और दमन में कमी हुई। ये बातें अस्पृश्यों के लिए तो गूलर का फूल ही थीं कि हिंदू अस्पृश्यता अभिशाप को मिटा दें।

अस्पृश्यों को हिंदू समाज में मिलाने के विषय में हिंदुओं को न तो कोई डर था और न ही कोई लाभ होने वाला था। वास्तव में उन्हें तो अस्पृश्यता समाप्त करने पर काफी हानी उठानी पड़ती। अस्पृश्यता की व्यवस्था हिंदुओं के लिए सोने की चिडि़या के समान थी। हिंदुओं की 24 करोड़ आबादी में से 6 करोड़ अस्पृश्य उनके नौकर चाकर की तरह उनकी सेवा करें, जिससे हिंदू व्यर्थ का आडम्बर और दिखावे के रूप में शिष्टाचार करके अपने को गर्व के साथ मालिक की उस श्रेणी में ला सकें। ऐसा तब तक नहीं हो सकता था कि जब तक उनके अधीन कमजोर लोग न हों। चौबीस करोड़ हिंदुओं में 6 करोड़ अस्पृश्यों से बेगार कराई जाती है, क्योंकि उनको अपनी निर्धनता और बेबसी के कारण विवश होकर थोड़े से पारिश्रमिक पर बेगार करनी पड़ती है और कभी-कभी तो उन्हें कुछ नहीं मिलता। इन 24 करोड़ हिंदुओं में 6 करोड़ अस्पृश्य अधिकतर भंगियों और झाडू लगाने वालों के रूप में हिंदुओं के घरों की सफाई का काम करते हैं, क्योंकि हिंदू धर्मानुसार उस गंदे काम को नहीं कर सकते। यह कार्य केवल हिंदुओं के लिए गैर-हिंदुओं को करना होता