वास्तविक मुद्दा
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है और वे गैर-हिंदू दूसरे नहीं, अस्पृश्य ही हो सकते हैं। 24 करोड़ हिंदुओं में 6 करोड़ अस्पृश्यों को नीच कामों तक ही सीमित रखा जाता है और उच्च श्रेणी के कार्यों तक पहुंचने से उन्हें रोका जाता है, क्योंकि उच्च श्रेणी के कार्य हिंदुओं के लिए सुरक्षित हैं। 24 करोड़ की जनसंख्या में 6 करोड़ अस्पृश्यों को गंदे स्थानों में रहने के लिए विवश किया जाता है। मानवता के इस अवमूल्यन में अस्पृश्य पहले जलता है और हिंदू बाद में।
कुछ लोगों का विश्वास है कि अस्पृश्यता धार्मिक व्यवस्था है। यह सच है, परंतु केवल यह मान लेना कि यह केवल धार्मिक व्यवस्था है भूल होगी। अस्पृश्यता धार्मिक व्यवस्था से कहीं बढ़ कर है। अस्पृश्यता आर्थिक व्यवस्था भी है, जो गुलामी से बदतर है। गुलामी में किसी हद तक मालिक गुलाम के भरण-पोषण की तो जिम्मेदारी लेता है, उसे खाना-कपड़े देता है, रहने के लिए घर देता है और उसे अच्छी हालत में रखता है, जिससे गुलाम का बाजारू मूल्य कम हो अर्थात् गुलाम ऐसे मालिक की गुलामी करने के लिए आसानी से मिल सकें। परंतु अस्पृश्यता की व्यवस्था में हिंदू अस्पृश्यों के भरण-पोषण अर्थात् उनके खाने-कपड़े की जिम्मेदारी नहीं लेता। आर्थिक व्यवस्था एसी है कि जिससे अस्पृश्यों का बेरोकटोक शोषण होता है। अस्पृश्यता अमिट आर्थिक शोषण का साधन भी है। यही कारण है कि इसकी भर्त्सना निष्पक्ष प्रशासकीय मशीनरी भी नहीं करती है, जो इस पर प्रतिबंध लगाए। क्यों ऐसी सार्वजनिक विचार की कोई संस्था नहीं जिससे अपील की जा सके, क्योंकि धारणाएं ऐसी हैं कि वहां पर भी उन हिंदुओं के विचारक शोषक वर्ग से संबंधित हैं, जिसके फलस्वरूप वे ऐसे शोषण के पक्षधर होते हैं। पुलिस अथवा न्यायपालिका का उन पर कोई प्रभाव नहीं, क्योंकि वे सभी हिंदुओं का ही खून होते हैं और शोषकों के पक्षपाती होते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि वे लोग जो विश्वास करते हैं कि अस्पृश्यता मिटने ही वाली है, वे हिंदुओं को मिलने वाले आर्थिक लाभ पर ध्यान नहीं देते। अस्पृश्यता से छुटकारा पाने के लिए अस्पृश्य कुछ नहीं कर सकते। इसमें अस्पृश्यायें का कोई दोष नहीं है। अस्पृश्यता हिंदुओं की मनोवृत्ति है। अस्पृश्यता निवारण के लिए हिंदुओं को अपने में परिवर्तन लाना होगा। क्या वे परिवर्तन लाएंगे?
क्या हिंदुओं का कोई ज़मीर है? क्या उनमें उचित-अनुचित के निर्धारण के लिए आवश्यक नीर-क्षीर विवेक है? क्या कभी हिंदुओं ने नैतिक बुराइयों के विरुद्ध क्रोध व्यक्त किया है? क्या हिंदू अस्पृश्यता को नैतिक दुराचार मानकर परिवर्तन लाने की धृष्टता करेगा? यदि यही मान लिया जाए कि हिंदू इतना जागरूक है कि वह सोच