208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सके कि वह भगवान को क्या जवाब देगा, तो क्या वह अस्पृश्यता से होने वाले आर्थिक और सामाजिक लाभ को छोड़ने के लिए तैयार है? इतिहास ऐसे निष्कर्षों को न्यायोचित नहीं ठहराएगा कि हिंदू समाज के पास विवेक है अथवा उसमें ऐसा नैतिक रोष है कि अस्पृश्यता जैसे दुराचार की जड़ खोदने के लिए जेहाद का आह्वान करे। इतिहास साक्षी है कि जहां नैतिक शास्त्र और अर्थशास्त्र का टकराव होता है, वहां अर्थशास्त्र की विजय होती है। यह कभी नहीं देखा गया कि निजी स्वार्थ वाले लोगों ने अपना स्वार्थ स्वतः ही त्याग दिया हो। उन पर दबाव डालने वाली शक्ति पैदा करने की क्षमता अस्पृश्यों में नहीं है। यह गरीब हैं और असंगठित हैं। यदि वे अपना सर उठाते हैं, तो कुचल दिए जाते हैं।
ऐसी व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है कि स्वराज्य से हिंदू अधिक दबंग बनेंगे और अस्पृश्य अधिक निस्सहाय और यह संभव है कि उनसे हिंदुओं को, जो आर्थिक लाभ मिलता है, स्वराज्य से अस्पृश्यता समाप्त होने के बजाए और बड़ेगी। यह कहना कि अस्पृश्यता समाप्त हो रही है, प्रकट रूप में एक खुशफहमी है और इसके पीछे है सफेद झूठ। अगर यह आपराधिक नहीं भी हो तो घोर मूर्खता की बात अवश्य होगी यदि अस्पृश्यता की समस्या को अस्थाई समस्या कह कर अस्पृश्यों के संवैधानिक संरक्षणों की जड़ काट दी जाए और अनिश्चित काल के इस प्रकार के वास्तविक तथ्यों की तरफ से आंख मूंद ली जाए।