9. विदेशियों से आग्रह - Page 225

210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दूसरी परिस्थिति यह है कि भारत के बाहर के लोग विश्वास करते हैं कि कांग्रेस की एकमात्र संस्था है, जो भारत का प्रतिनिधित्व करती है, यहां तक कि अस्पृश्यों का भी। इसका कारण यह कि अस्पृश्यों के पास अपना कोई साधन नहीं है, जिससे वे कांग्रेस के मुकाबले में अपना दावा जता सकें। अस्पृश्यों की इस कमजोरी के और भी कई कारण हैं। उनके पास प्रेस नहीं है और कांग्रेस का प्रेस उनके लिए बंद है। उसने अस्पृश्यों का रत्ती भर भी प्रचार न करने की कसम खा रखी है। अस्पृश्य अपना प्रेस स्थापित नहीं कर सकते। यह स्पष्ट है कि कोई भी समाचार-पत्र बिना विज्ञापन राशि के नहीं चल सकता। विज्ञापन राशि केवल व्यावसायिक विज्ञापनों से आती है। चाहे छोटे व्यवसाय हों या बड़े वे सभी कांग्रेस से जुड़े हैं और गैर-कांग्रेसी संस्था का पक्ष नहीं ले सकते। भारत के एसोसिएटेड प्रेस का स्टाफ, जो भारत की समाचार एजेंसी है, पूर्णतया मद्रासी ब्राह्मणों से भरा पड़ा है। वास्तव में भारत का संपूर्ण प्रेस उन्हीं की मुट्टòी में है और वह पूर्णतया कांग्रेस की पिट्ठू है, जो कांग्रेस के विरुद्ध किसी समाचार को नहीं छाप सकती। यही कारण है जो अस्पृश्यों की पहुंच के बाहर है। परंतु किसी हद तक स्वयं अस्पृश्यों में प्रचार करने की प्रवृत्ति का न होना भी एक कारण है। प्रचार करने की प्रवृत्ति का न होना, उनकी देशभक्ति के कारण भी है कि कहीं ऐसा न हो कि कोई बात ऐसी हो जाए, जिससे देश की प्रतिष्ठा पर बाहर आंच आए। भारत की राजनीति के दो भिन्न-भिन्न पहलू हैं जिनका विदेशी राजनीति और संवैधानिक राजनीति के रूप में भेद किया जा सकता है। भारत की विदेशी राजनीति ब्रिटिश साम्राज्य से भारत को आजादी प्राप्त करने के संबंध में है, जबकि संवैधानिक राजनीति आजाद भारत के लिए भावी संविधान से संबंधित है। दोनों वास्तव में एक दूसरे से भिन्न हैं। परंतु अस्पृश्यों को डर है कि भारतीय राजनीति के दो पहलू हैं, जो अलग-अलग किए जा सकते हैं। कांग्रेसी लोग अस्पृश्यों के देश प्रेम के सिद्धांत को नहीं मानेंगे और वे कांग्रेसी प्रचार पर चुप्पी साधे हुए हैं। वास्तविक बात यह है कि अपने मामले में मुखर न होने और कांग्रेस की खुली चुनौती की उपेक्षा करने के कारण ही लोगों को भ्रम होने लगा कि कांग्रेस ही सबका प्रतिनिधित्व करती है, यहां तक कि अस्पृश्यों का भी।

यद्यपि यह स्थिति खेदपूर्ण है तथापि यदि विदेशी प्रचार से प्रभावित हो जाते हैं तो उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि चुनाव में कांग्रेस के प्रतिनिधित्व के दावे की परीक्षा नहीं हुई थी। परंतु 1937 के चुनावों में कांग्रेस की परीक्षा हुई। उससे चुनाव के जो परिणाम सामने आए, कांग्रेस को जो भी विजय मिली वह प्रचार के बल पर मिली और उसका सबका प्रतिनिधित्व करने का दावा झूठा साबित हुआ।