212 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हो जाना मूर्खता होगी कि कांग्रेस भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रही है और निम्न स्तर के लोगों की आजादी के लिए भी लड़ रही है।
यह प्रश्न कि आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही है, कोई महत्व नहीं रखता। महत्व इस प्रश्न का है कि कांग्रेस किसके लिए आजादी की लड़ाई लड़ रही है। यह युक्तिसंगत और आवश्यक परीक्षा है और बिना तथ्य का पता लगाए किसी स्वतंत्रता प्रेमी के लिए आंख मूंद कर कांग्रेस का समर्थन देना बड़ी भूल होगी। परंतु वे विदेशी, जो कांग्रेस का ही पक्ष लेते हैं, ऐसे प्रश्न उठाने की चिंता नहीं करते। ऐसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर विदेशी उदासीन क्यों हो जाते हैं? जहां तक मैं इसे समझ सकता हूं, इस उदासीनता का कारण पश्चिम में प्रचलित स्वायत्त शासन और प्रजातंत्र के बारे में विद्यमान गलत धारणाओं में पाया जाता है और उसी से भारत की राजनीति में रुचि रखने वाले विदेशी प्रभावित हैं।
राजनीतिक क्षेत्र में पश्चिमी विचारकों द्वारा सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं कि स्वायत्तशासी सरकार के लिए संवैधानिक नैतिकता का होना आवश्यक है जिसे ग्रोटऽ ख्1, के अनुसारः फ्किसी संवैधानिक स्वरूप का सर्वोच्च सम्मान इसी बात में है कि उसके अधीन कार्यरत कार्यपालकों से आज्ञापालन कराया जाए, यद्यपि उनको एक निश्चित वैधानिक संयम के अंतर्गत स्पष्ट बोलने की छूट दी जा सकती है तथापि उनके सार्वजनिक कृत्यों के लिए जन-भावनाओं पर संपूर्ण विश्वास के साथ उन्हें जम कर फटकार भी लगाई जाए तथा पार्टी कार्यों में कड़वाहट को स्वीकार किया जाए, तभी संवैधानिक स्वरूप निर्दोष कहा जा सकता है। वह विरोधियों की दृष्टि में और भी अधिक पवित्र होगा।य् यदि जनसाधारण में ऐसी आदतें विद्यमान हैं, तब पाश्चात्य राजनीतिक विचारकों के अनुसार स्वायत्त-शासन एक वास्तविकता हो सकता है और उसके आगे और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार पश्चिमी विचारक प्रजातंत्र के विषय में विश्वास करते हैं कि आदर्श प्रजातंत्र के लिए क्या आवश्यक है। जैसा कि जनता का शासन एक वास्तविकता हो सकता है और उसके आगे और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, उसी प्रकार पश्चिमी विचारकों को प्रजातंत्र के विषय में विश्वास है कि आदर्श प्रजातंत्र में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था हो और दूसरे उपाय भी सुझाए गए हैं, जैसे कि प्रतिनिधियों को वापस बुला लेने का अधिकार, जनमतसंग्रह और अल्पकालिक संसद। कुछ देशों में वयस्क मताधिकार से अधिक कुछ करना आवश्यक नहीं समझा गया।
- ग्रोट हिस्ट्री ऑफ ग्रीस, खंड 3, पेज संख्या 347