विदेशियों से आग्रह
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मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि ये दोनों धारणाएं मिथ्या और भ्रामक हैं। यदि प्रजातंत्र और स्वराज्य सभी देशों में असफल रहे हैं, तो इसका सबसे बड़ा कारण इन गलत धारणाओं का होना है। संवैधानिक नैतिकता के संस्कार संवैधानिक ढंग की सरकार को कायम रखने के लिए आवश्यक हो सकते हैं, परंतु संवैधानिक ढंग की सरकार कायम रखना वैसा ही नहीं है, जैसा कि जनता की स्वराज्य सरकार। इसी प्रकार यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि वयस्क मताधिकार के आधार पर तार्किक विचार से एक सम्राट की सरकार के मुकाबले में भेद रखते हुए जनता की सरकार बन सकती है। परंतु उसे जनता द्वारा सरकार और जनता के लिए सरकार के विचार से प्रजातांत्रिक सरकार लाने वाली पद्धति नहीं कहा जा सकता।
प्रजातंत्र और स्वराज्य की राजनीति के संबंध में पश्चिमी विचारकों के ये विचार बहुत से कारणों से त्रुटिपूर्ण हैं। पहली बात तो यह है कि वे निर्विवाद तथ्यों पर नहीं विचार करते कि प्रत्येक देश में ऐतिहासिक परिस्थितियों के बल पर एक शासक वर्ग उत्पन्न होता और बढ़ता है, जिसे शासन करने के लिए नियुक्त किया जाता है, जो शासन करता है, और जिसके लिए वयस्क मताधिकार और संवैधानिक नैतिकता की सीमाएं नहीं होतीं। वे उसे अपार शक्ति और अधिकार प्राप्त करने से नहीं रोक सकती, क्योंकि इस वास्तविक कारण से शासित वर्ग अपना स्वाभाविक नेता मान कर उन्हें इच्छा से चुन लेते हैं। दूसरी बात यह है कि वे इतना नहीं समझ पाते कि शासक वर्ग प्रजातंत्र और स्वराज्य विरोधी होता है और जहां शासक वर्ग शासन पर कब्जा जमाए रखता है, यह कहना गलत नहीं होगा कि वहां प्रजातंत्र और स्वराज्य विद्यमान है जब तक कि प्रजातंत्र वास्तविक न हो। तीसरी बात यह है कि वे यह नहीं जानते कि केवल वयस्क मताधिकार पर आधारित संविधान के होने से ही वास्तव में स्वराज्य और प्रजातंत्र नहीं होता बल्कि उसमें वास्तविकता तब आती है जब शासक वर्ग से शासन करने की शक्ति भी छीन ली जाए। चौथे, वे उस तथ्य की उपेक्षा करते हुए प्रतीत होते हैं कि कुछ देशों में शासित वर्ग शासकों को मताधिकार के बल पर सत्ताच्युत करने में सफल हो सकता है, परंतु कुछ अन्य देशों में हुए मताधिकार द्वारा अपने लक्ष्य की प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य संरक्षणों की भी आवश्यकता है। अंतिम बात यह है कि वे उस तथ्य की ओर नहीं ध्यान देते कि यदि शासक वर्ग अस्तित्व में है तो प्रजातंत्र और स्वराज्य की किसी योजना पर विचार करते हुए महत्वपूर्ण बात शासक वर्ग के सामाजिक दृष्टिकोण और उसकी सामाजिक विचारधारा है क्योंकि जब तक शासक वर्ग के पास शासन करने की शक्ति अपने पास रखने की क्षमता है तब तक शासक वर्ग की सामाजिक विचारधारा और उसके जीवन-दर्शन पर ही दास वर्ग की स्वतंत्रता और कल्याण निर्भर करता है।