9. विदेशियों से आग्रह - Page 229

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जब शासक वर्ग मौलिक तथा निर्णायक स्थिति में होता है, तो उसका प्रजातंत्र से टकराव होता है। तब स्वराज्य और लोकतंत्र के हामियों को उसकी रक्षा हेतु स्वयं आगे आना होता है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व इस बात की उपेक्षा घातक होगी कि एक स्वतंत्र देश में क्या स्वतंत्रता केवल शासक वर्ग के लिए ही है अथवा सबके लिए। इसलिए मेरे विचार से कांग्रेस का पक्ष लेने वाले विदेशियों से पूछा जा सकता है कि क्या कांग्रेस आजादी के लिए लड़ाई लड़ नहीं रही है? यह प्रश्न पूछने के बजाए उन्हें पूछना चाहिए कि फ्कांग्रेस किसके लिए आजादी की लड़ाई लड़ रही है? क्या वह शासक वर्ग की लड़ाई लड़ रही है अथवा भारत के लोगों की आजादी की लड़ाई लड़ रही है।य् यदि इसके देशों को यह ज्ञात हो कि कांग्रेस शासक वर्ग की आजादी के लिए लड़ रही है तो उसे कांग्रेसियों से पूछना चाहिए कि क्या भारत में शासक वर्ग शासन करने योग्य है। यह कम से कम ऐसी बात है जिस पर विचार करने के बाद ही कांग्रेस का पक्ष लेना चाहिए।

क्या इस प्रश्नों का उत्तर कांग्रेस के पास है? मैं नहीं जानता। लेकिन मेरे विचार से मैं उन प्रश्नों का जो उत्तर दे सकता हूं वही सही उत्तर है।

III

आरंभ में, हमें यह जान लेना चाहिए कि भारत में शासक वर्ग कौन है? भारत से शासक वर्ग मुख्यतया ब्राह्मण हैं। यह आश्चर्य की बात है कि आज के ब्राह्मण इस कथन का खंडन करते हैं कि वे शासक वर्ग से संबंधित हैं, यद्यपि वे किसी समय अपने को भूदेव कहते थे। क्या इसका कारण यह है कि वे अब यह महसूस करने लगे हैं कि उन्होंने मानवता के इस पावन नियम द्वारा कि अपने वर्ग के ही नहीं वरन सभी वर्गों के हितों की रक्षा करनी चाहिए प्रत्येक समुदाय के प्रबुद्ध वर्गों में किए गए विश्वास को तोड़ने का अपराध किया है और इसलिए वे दुनियां को मुंह दिखाने लायक नहीं हैं अथवा क्या यह उनका विनम्र भाव है? अब यह देखा जाए कि इसमें से सच क्या है?

ब्राह्मण की शासक वर्ग है, इस पर प्रश्नवाचक चिह्न नहीं लगाया जा सकता। दो प्रकार से इसकी परीक्षा की जा सकती है। प्रथम परीक्षा लोगों की भावना की और दूसरी प्रशासन पर नियंत्रण रखने की। मुझे विश्वास है इन दो से अच्छा और कोई परीक्षण नहीं हो सकता। जहां तक पहले परीक्षण की बात है, उसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता। जनसाधारण की भावना के अनुसार ब्राह्मण पवित्र हैं। प्राचीन काल में ब्राह्मण चाहे कितना जघन्य अपराध कर दे, उसे मृत्यु दंड नहीं दिया जा सकता था। उसे पवित्र मनुष्य मान कर ही सभी प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थीं। दास वर्ग ही सुविधाओं से वंचित रखा गया था। प्रथम फल प्राप्त करने का वही अधिकारी था।