9. विदेशियों से आग्रह - Page 237

222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विस्तार करेगा। प्राथमिक शिक्षा का प्रसार करेगा, नशाबंदी लागू करेगा, चरखा चलाना सिखाया जाएगा, सड़कें और नहरें बनाई जाएंगी, मुद्राकोष में बढ़ोतरी की जाएगी मापतौल को विनियमित किया जाएगा, अस्पताल खोले जाएंगे और शासित वर्गों की दशा में सुधार लाने के उपाय किए जाएंगे। ऐसी योजना में भी शासित वर्ग में अधिक उत्साह का संचार न होगा। पहली बात तो यह कि इस योजना में कोई बड़ी बात नहीं की गई है। आजकल की दुनियां में कोई भी शासक वर्ग समाज में ये आवश्यक सुधार करने की उपेक्षा नहीं कर सकता, जो किसी देश के सभ्य समाज के लिए आवश्यक समझे जाते हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं भारत में शासक वर्ग पर इस बात का संदेह करता हूं कि सामाजिक उत्थान को ऐसी मामूली योजना को चलाने के लिए आगे आएंगे। बहुत से लोग भूल जाते हैं कि कांग्रेस का नेतृत्व आजकल जिसके हाथों में है और जैसी योजनाएं चलाने का प्रचार किया जा रहा है उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिटिश नौकरशाही से कांग्रेस बेहतर है। परंतु नौकरशाही से मुक्त हो जाने से क्या अधिकतर जनता के भाग्य को संवारने के लिए वही प्रोत्साहन बना रहेगा। इस बात पर मुझे संदेह है। इसके अतिरिक्त, इसमें क्या स्वराज्य का लक्ष्य समाजोत्थान ही होगा? शासित वर्गों के संबंध में मुझे संदेह है कि स्वतंत्र भारत में वे आशा के अनुरूप ब्राह्मणवाद का, जो समाज का जीवन-दर्शन है, पूर्ण उन्मूलन कर देंगे। मेरे कहने का आशय है कि शासित वर्ग के लोग सामाजिक उत्थान की परवाह नहीं करते। साधनों की कमी और निर्धनता ही जिनका भाग्य है, वह उनके उस अपमान और तिरस्कार की तुलना में कुछ भी नहीं है, जो दूषित सामाजिक व्यवस्था के फलस्वरूप सभी प्रकार के कष्ट सहन कर रहे हैं, वे दौलत नहीं इज्जत चाहते हैं। इसीलिए प्रश्न यह है कि क्या स्वतंत्र भारत में सत्ता में आने के बाद शासक वर्ग सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए कोई योजना चलाएगा।

कांग्रेसियों का यह कहना है कि पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद ही कांग्रेस आश्चर्यजनक कार्य कर सकती है। यदि यह मान लिया जाए कि वह केवल प्रचार के लिए नहीं, वरन् ईमानदारी की बात है, तो हम सोचते हैं कि शासक वर्ग केवल सत्ता प्राप्त करने के लिए ऐसा कहता है। मान लिया जाए यह एक ईमानदारी है और प्रोपेगंडा ही नहीं है, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि वह इतना ही कर ले, जो सत्ता हथियाने के लिए जरूरी है। ऐसा विश्वास दयनीय नहीं है, परंतु भयानक छलांग है। वे लोग जो ऐसे भ्रमजाल में फंसना चाहते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि प्रभुसत्ता की भी सीमाएं होती हैं, चाहे वह कितनी ही सार्वभौमिक हो। इस विषय में श्री डायसी से बढ़कर किसी ने नहीं कहा। अपनी फ्लॉ ऑफ द कांस्टीट्यूशनय् में उन्होंने कहा है µ