9. विदेशियों से आग्रह - Page 238

विदेशियों से आग्रह

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फ्कोई भी प्रभुतासंपन्न शासन विशेष रूप से संसदीय, दो सीमाओं मे बंधा होता है। एक बाह्य तथा दूसरी आंतरिक। शासक की बाह्य सीमआों के कारण सहभावना निश्चित होती है कि उसकी प्रजा अथवा उसमें से बहुत सारे लोग उसके आदेशों की अवहेलना कर सकते हैं या प्रतिरोध कर सकते हैं।

फ्वह बाह्य सीमाएं निरंकुश शासकों की भी होती हैं। 18वीं सदी के मध्य में चाहे रोमन सम्राट रहे हों अथवा फ्रांसीसी सम्राट, कानून की शक्ल में वे बहुत सख्त शासक थे। जैसा कि आजकल रूस के जार सम्राट। प्रभुतासंपन्न शासकों में कानून और कानून बनाने के सारे अधिकार अंतर्निहित थे। उसका बनाया हुआ प्रत्येक कानून आवश्यक रूप से मानना पड़ता था और उसके राज्य में परंतु यह समझना भूल होगी कि वे चाहे जितने स्वेच्छाचारी शासक रहे हों, सदा स्वेच्छा से कानून बनाते थे।

फ्शासक सम्राट चाहे जितना निरंकुश हो अपनी प्रजा तथा प्रजा के कुछ भाग द्वारा उसके आदेश इसी बात पर निर्भर थे कि उन्हें मानने के लिए प्रजा कहां तक तैयार है और यह भी वास्तविक सीमाओं में होता था। यह बात इतिहास की बदनाम घटनाओं में भी मौजूद है। प्राचीन काल के सीजर्स में से किसी ने भी रोमन साम्राज्य की पूजा करने के मूल संस्थानों को नष्ट नहीं किया। सुलतान इस्लाम को नहीं समाप्त कर सका।

फ्लुई चौदहवें ने जो सर्वशक्तिसंपन्न था नान्ते के आदेश का खंडन किया, परंतु उसने जान लिया कि प्रोटेस्टेंट की महत्ता को समाप्त करना असंभव है और इसी कारण से जेम्स द्वितीय, रोमन कैथोलिक धर्म की स्थापना करने से रुक गया। निरंकुश शासक की शक्ति अथवा संसद की प्रभुत्ता भी जनता द्वारा नियंत्रित होती है। स्काटलैंड में संसद धर्माध्यक्ष चर्च का शासन स्थापित कर सकती थी, संसद उपनिवेशों पर टैक्स लगा सकती थी, संसद कानून में परिवर्तन अथवा संशोधन किए बिना शासक के उत्तराधिकार को समाप्त कर सकती थी, परंतु जैसा कि सभी लोग जानते हैं, आजकल की दुनियां में ब्रिटिश पार्लियामेंट इनमें से कुछ नहीं कर सकी। इन सभी विषयों पर कानून बनाना यद्यपि वैध था तब भी पार्लियामेंट की शक्ति के परे था।

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फ्प्रभुता के प्रयोग की आंतरिक सीमा प्रभुता की प्रकृति में ही निहित होती है। यहां तक कि निरंकुश शासक भी अपने चरित्र और गुणों के अनुसार अपनी शक्ति का प्रयोग करता है, और उसका चरित्र उन परिस्थितियों से प्रभावित होता है जिनमें वह रहता है। सुल्तान चाहते हुए भी मुस्लिम विश्व के धर्म इस्लाम को नहीं बदल सकता था। परंतु यदि सुल्तान ऐसा करता भी, तो उस पर आंतरिक सीमाओं के साथ-साथ