9. विदेशियों से आग्रह - Page 239

224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बाह्य सीमाएं भी सुदृढ़ थीं। कभी-कभी लोग यह निरर्थक प्रश्न कर बैठते हैं कि पोप कोई सुधार लागू क्यों नहीं करता? इसका उत्तर यही है कि पोप क्रांतिकारी मनुष्य नहीं हो सकता और वह जो पोप हो जाता है उसकी इच्छा क्रांतिकारी बनने की नहीं होती।य्

डायसी ने जो कुछ कहा उसकी सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता। शासक वर्ग क्या कर सकता है, वह उसकी प्रभुता के पैमाने पर उतना नहीं निर्भर करता, जितना कि प्रभुता की उन बाहरी और भीतरी सीमाओं पर करता है जिनका डायसी ने उल्लेख किया है। इन दोनों में से यदि भला करने में बाहरी सीमाओं के कारण असफलता मिलती है, तो किसी को शासक वर्ग पर दोष मंडन की जरूरत नहीं। उन्नति में बाधक बाहरी सीमाओं से भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि शासक वर्ग के आंतरिक प्रतिबंध ऐसे हैं, जो बाह्य प्रतिबंधों से कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं। प्रगति शासक वर्ग के बाह्य प्रतिबंधों की अपेक्ष आन्तरिक प्रतिबंधों पर अधिक निर्भर करती है। वे कौन से निर्णायक तत्व हैं, जो आंतरिक प्रतिबंधों का निर्धारण करते हैं? आंतरिक प्रतिबंध शासक वर्ग के दृष्टिकोण, प्रथाओं, अंतर्निहित हितों और उनके सामाजिक-दर्शन में उत्पन्न होते हैं। इस विचार-विमर्श का उद्देश्य है कि विदेशियों को इस बात से सावधान करना कि कांग्रेस शासित वर्ग के लिए क्या करना चाहती है उस पर विश्वास करने से पहले उन्हें कांग्रेस से पूछना चिहए कि शासक वर्ग का वास्तविक दृष्टिकोण क्या है, उसकी क्या परंपराएं हैं, उसका सामाजिक-दर्शन क्या है?

पहले ब्राह्मणों को ही लीजिए, इतिहास के अनुसार वे शासित वर्ग (शूद्रों और अस्पृश्यों) के जो कुल हिंदुओं की आबादी के 80 प्रतिशत हैं, बहुत ही घोर शत्रु रहे हैं और दीन-हीन शासित वर्ग कितना नीचे गिरा हुआ है, अपमानित है, निराश है, कुंठित है, वह केवल ब्राह्मणों के कारण और उनके दर्शन के कारण ही ऐसा है। ब्राह्मणवाद के इस दर्शन के 5 मूलभूत सिद्धान्त हैं - (1) विभिन्न वर्गों में असमानता_ (2) शूद्रों और अस्पृश्यों पर शस्त्रादि रखने पर पूरी रोक_ (3) शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए शिक्षा का द्वार बंद करना_ (4) सत्ता और अधिकार से शूद्रों और अस्पृश्यों को दूर रखना_ (5) शूद्रों और अस्पृश्यों को संपत्ति अधिग्रहण से वंचित रखना_ और (6) स्त्रियों की पूर्ण अधीनता एवं दमन। असमानता ब्राह्मणवाद का अधिकारिक सिद्धांत है और दलितों द्वारा समानता के लिए प्रयास पर उनका दमन करने के असीम अधिकार ब्राह्मणों को प्राप्त हैं। कुछ देश ऐसे हैं, जहां शिक्षा कुछ लोगों तक ही सीमित है। परंतु भारत ही एक ऐसा देश है, जहां प्रबुद्ध वर्ग - जैसे कि ब्राह्मणों ने शिक्षा पर एकाधिकार ही नहीं