विदेशियों से आग्रह
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कर रखा है, बल्कि निम्न वर्गों का शिक्षा ग्रहण करना अपराध मानकर जीभ काट लेने की सजा अथवा अपराधी के कान में पिघला हुआ सीसा डालने की व्यवस्था की है। कांग्रेसी राजनीतिज्ञ शिकायत करतें हैं कि अंग्रेज भारतीय जनता को पूर्णतया शक्तिहीन करके शासन कर रहे हैं। परंतु वे भूल जाते हैं कि शूद्रों और अस्पृश्यों को शक्तिहीन करने का कानून ब्राह्मणों द्वारा लागू किया गया था। वास्तव में शूद्रों और अस्पृश्यों को शक्तिहीन रखने में ब्राह्मण अटल विश्वास रखते हैं। जब ब्राह्मणों को शस्त्र धारण करने की आवश्यकता हुई तो अपनी सुख सुविधाओं की सुरक्षा के लिए उन्होंने शस्त्र धारण कर लिए। उसके लिए उन विधानों का पुनरीक्षण कर डाला और शूद्रों तथा अस्पृश्यों को बिना उनकी मुसीबतों को सुने शस्त्ररहित ही रखा। यदि आज भारत की जनसंख्या में अधिकांश लोग पौरुषहीन हैं, उनका मनोबल नष्ट हो गया है और वे दुर्बल हो गए हैं तो उसका मुख्य कारण है ब्राह्मणों की पूर्ण निरस्त्रीकरण की नीति, जिसे वे युग युगान्तर से शूद्रों के प्रति अपनाते चले आ रहे हैं। कोई भी ऐसी सामाजिक बुराई तथा सामाजिक कुप्रथा नहीं है, जिस पर ब्राह्मणों की मुहर न लगी हो। मानव का मानव के प्रति अमानुषिक व्यवहार, जैसे कि जातिपांति की भावना, अस्पृश्यता, उच्च पद पर पहुंचने पर रोक, योग्यता की अनदेखी करना ब्राह्मणों का धर्म है। यह मान लेना गलत न होगा कि किसी मनुष्य द्वारा दूसरे के साथ ऐसे पाशविक व्यवहार करना ही ब्राह्मण धर्म है, क्योंकि ब्राह्मणों ने समाज की पतिततम प्रथा को शह दी, जिससे भारत में स्त्रियों को जितने घोर कष्ट उठाने पड़े उनकी संसार के किसी अन्य भाग से तुलना नहीं की जा सकती। विधवाओं को सती होने के नाम पर जीवित आग में झोंक दिया जाता था। ब्राह्मणों ने सती प्रथा को पूर्ण समर्थन दिया। विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह करने पर प्रतिबंध लगा दिया। ब्राह्मणों ने इस आचरण को दृढ़ता से स्थापित किया। बालिकाओं का विवाह आठ वर्ष की अवस्था में पहले कर दिया जाता था और पति को अधिकार था कि विवाह के बाद किसी भी समय वह विवाह संबंध तोड़ सकता था। चाहे वह लड़की पूर्ण यौवन प्राप्त कर रजस्वला आयु की हो अथवा नहीं। ब्राह्मणों ने इस सिद्धांत को पूरा प्रश्रय दिया। शूद्रों, अस्पृश्यों और नारी के लिए ब्राह्मणों ने, जो घृणित विधान रखे संसार के अन्य भागों में किसी बौद्धिक वर्ग में उनका सानी नहीं, क्योंकि संसार के अन्य भागों में बौद्धिक वर्ग ने अपने ही देश के अशिक्षित लोगों को सदा के लिए अज्ञानता और निर्धनता के गर्त में नहीं धकेला जैसा कि भारत में ब्राह्मणों ने किया है। आज का प्रत्येक ब्राह्मण अपने पूर्वजों द्वारा प्रतिपादित ब्राह्मणवाद के दर्शन में पूरा विश्वास करता है। वह हिंदू समाज में एक निराली ही चीज है। शूद्र और अस्पृश्य ब्राह्मण के लिए विदेशी जैसे हैं, जैसा कि जर्मन के लिए फ्रांसीसी, यहूदी के लिए गैर-यहूदी, गोरों के लिए नीग्रो। उसके और निम्न वर्गीय शूद्रों तथा अस्पृश्यों के बीच यह वास्तविक गहरी और चौड़ी खाई है। ब्राह्मण उनसे केवल परहेज ही नहीं करता बल्कि उनके प्रति कठोर भी है। उनके आपसी संबंधों में विवेक और न्याय की कोई गुंजाइश नहीं है।