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अनोखी घटना

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देना चाहता हूं कि कांग्रेस केवल किसी एक वर्ग अथवा सम्प्रदाय या भारत के किसी एक भाग का प्रतिनिधित्व नहीं करती है वरन् भारत के प्रत्येक भाग, समस्त वर्गों एवं समस्त संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करती है। और इस बात को देखते हुए यह आपत्ति विचित्र लगती है। जबकि समाज सुधार का कोई भी प्रश्न अनिवार्यतः भारत के किसी विशेष भाग या संप्रदाय से जुड़ा है और सज्जनों मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यद्यपि हमारी मुसलमानों की भी वैसी ही सामाजिक समस्याएं हैं जैसी कि हमारे हिंदू और पारसी मित्रों की हैं और उन्हें हमें हल करना है। तथापि ऐसे प्रश्नों पर उन्हीं संप्रदायों के नेताओं को ही विचार करना चाहिए जिनकी वे समस्याएं हैं। सज्जनों, मैं समझता हूं कि यहां हमें अपने आपको उन्हीं मामलों एवं प्रश्नों तक सीमित रखना चाहिए जिनसे संपूर्ण भारत प्रभावित होता है और हमें किसी विशेष समुदाय या क्षेत्र विशेष को प्रभावित करने वाले प्रश्नों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए।य्

तीसरी बार इस विषय पर 1892 में उल्लेख किया गया जब श्री डब्ल्यू.सी. बनर्जी ने आठवें अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान निम्नलिखित उद्गार प्रकट किए µ

फ्हमारे आलोचक ये कहते हैं µ मानों वे हमारे मामलों को हमसे अधिक जानते हैं - कि हमें राजनैतिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वरन् राजनीति को एक तरफ करके सामाजिक कार्यों में लग जाना चाहिए और अपने देश की सामाजिक व्यवस्था को उन्नत करना चाहिए। मैं उन्हीं में से एक हूं जो सामाजिक मामलों की सार्वजनिक चर्चा में विश्वास नहीं रखते हैं और मेरे विचार से समाज सुधार का यह काम उसी सम्प्रदाय के उन्हीं लोगों पर छोड़ देना चाहिए जो उस समाज के हैं और वे जितना कार्य करना चाहें करें। हम जानते हैं कि जब सामाजिक विषयों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा की जाती है तो लोग कितने उत्तेजित हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, अभी हाल में ही वायसराय की लेजिस्लेटिव काउंसिल में फ्एज ऑफ कंसेंट बिलय् पेश हुआ था। उस पर जो विवाद उठ खड़ा हुआ था मैं उसके गुण-दोषों में नहीं जाना चाहता, परंतु मैं यह संकेत देना चाहता हूं कि यदि सामाजिक मामलों पर जनता की इच्छा के प्रतिकूल शत्रुतापूर्ण तौर-तरीकों से किसी ने चर्चा की तो जनता आंदोलित हो उठेगी। मेरा संकेत है कि हम सब समाज सुधार का सही अर्थ नहीं समझते। हम में से कुछ लोग चाहते हैं कि हमारी लड़कियों