9. विदेशियों से आग्रह - Page 241

226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बनिया इतिहास में परजीवी अमरबेल के नाम से जाना जाता है। उसकी संस्कृति और प्रवृत्ति मात्र धन बटोरना है। वह उस पिस्सू के समान हैं, जो किसी भयंकर महामारी के समय तेजी से पनपता है। उसमें और बनिए में केवल इतना अंतर है कि पिस्सू स्वयं कोई महामारी नहीं फैलाता, जबकि बनिया महामारी पैदा करता है। वह अपने धन को उत्पादक कार्यों में नहीं लगता, बल्कि गरीबी और अधिक गरीबी बढ़ाने के लिए अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण के रूप में लगाता है। वह ब्याज पर जीता है और जैसा कि उसे उसका धर्म बताता है कि उसके लिए ब्याज पर ऋण देने का धंधा मनु ने निर्धारित किया है, जिसे वह उचित और न्यायपरक तथा धार्मिक मानता है। ब्राह्मण न्यायाधीश सदैव उस बनिए के पक्ष में निर्णय देने के लिए तैयार रहता है और बनिया उस ब्राह्मण न्यायाधीश की सहायता से अपना धंधा फैलाता है। ब्याज, चक्रवृद्धि ब्याज सब जोड़ते हुए वह निर्धनों को अपने जाल में फंसा लेता है। कर्जदार जितना भी ऋण अदा करता है, कर्जा बढ़ता ही जाता है। ऐसा करने में बनिए को किसी जमीर की आवश्यकता नहीं, वह इसे छलकपट नहीं समझता और सभी तरह से वाक्छल करता है। राष्ट्र पर उसका पूरा नियंत्रण होता है। सारे निर्धन भूखे नंगे बनिए के बंधक बनकर रह गए हैं।

कुल मिलाकर नतीजा यह निकलता है कि ब्राह्मण मस्तिष्क से गुलाम बनाता है और बनिया शरीर से। ये दोनों मिलकर शासन पर कब्जा कर लेते हैं और उसे चाट जाते हैं। यदि कोई इस देश के आचरण, परंपराओं और दर्शन को समझता है, तो क्या विश्वास कर सकता है कि स्वतंत्र भारत में कांग्रेसी शासन में आज की अपेक्षा स्थिति कुछ भिन्न होगी।

V

यदि कांग्रेस जो शासित वर्गों का संरक्षक बनने का दावा करती है, अपने कार्य व्यवहार में सब तरह से ईमानदार है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह शासक वर्ग की शक्ति को क्षीण करने के लिए क्या कदम उठाएगी। कांग्रेस बार-बार गला फाड़ कर चिल्ला चिल्ला कर कहती है कि उसने 1937 के चुनावों में प्रचंड विजय प्राप्त की है। अतिशयोक्ति पर कान न देकर उससे प्रश्न किया जाए कि यह सच है कि कांग्रेस की विजय हुई परंतु उसे किस वर्ग ने विजय दिलाई? दुर्भाग्यवश वर्तमान समय की स्थिति का अवलोकन करने वाले किसी भारतीय लेखक ने डोड-संसदीय नियमावली का संकलन नहीं किया।

फलतः कांग्रेस टिकट पर विधानसभाओं के सदस्यों की जाति, उनके पेशे, शिक्षा और उनके सामाजिक स्तर के विषय में सही-सही विवरण प्राप्त करना कठिन है।