विदेशियों से आग्रह
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आदेश जारी करें। सिविल एवं दंड संहिता और सैनिक कानून यहां तक
कि वर्दी तथा युद्ध-सामग्री के निर्माण संबंधी नियम भी सम्राट द्वारा बनाए
जाएं। साम्राज्य के सभी छोटे और बड़े मामले निपटाने के लिए सम्राट के
पास भेजे जाएं।य् ख्1,
इस संबंध में जापान के शासक वर्ग की तुलना में भारत का शासक वर्ग कैसा है? यह एकदम विपरीत है। भारत में शासक वर्ग ब्राह्मण भारतीय स्वतंत्रता की बलिवेदी पर ऐसा बलिदान करने का संकल्प नहीं कर सकता। राष्ट्रीयता के नाम पर अपनी सुख-सुविधाओं का परित्याग करने के बजाए भारत का शासक वर्ग अपनी सुख-सुविधाओं को पक्का बनाए रखने के लिए राष्ट्रीयता का नारा लगाकर उसका दुरुपयोग करता है। जब कभी शोषित वर्गों के लोग सरकारी सेवाओं में, कार्यपालिका में तथा विधानमंडलों में संरक्षण की मांग करते हैं, तब शासक वर्ग फ्राष्ट्रीयता खतरे में हैय् का नारा बुलंद करता है। लोगों से कहा जाता है कि यदि हमें राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करनी है तो हमें राष्ट्रीय एकता बनाए रखनी चाहिए और सरकारी सेवाओं में, कार्यपालिका में तथा विधानमंडलों में संरक्षण आदि राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल हैं, इसलिए जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें इस प्रकार के संरक्षण की मांग का डटकर विरोध करना चाहिए। यह है भारत के शासक वर्ग की धारणा। भारत का शासक वर्ग जापान के शासक वर्ग से पूर्णतया विपरीत दृष्टिकोण रखता है। राष्ट्रीयता के लिए अपनी सुख-सुविधाओं का बलिदान करना तो दूर रहा, शासक वर्ग अपने को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रीयता के नाम का दुरुपयोग करता है।
भारत में शासक वर्ग अपनी सत्ता और शक्ति को त्यागने से इंकार ही नहीं करता वरन् शोषित वर्गों की राजनीतिक मांग की खिल्ली उड़ाने से भी कभी नहीं चूकता।
वही पृ. 233
डॉ. आर.पी. परांजपे द्वारा लिखित व्यंग है। मई 1926 में ‘गुजराती पंच’ नामक पत्रिका में फ्भविष्य की
एक झलकय् शीर्षक के अंतर्गत छपा था। शासक वर्ग के सदस्यों के लेखन के नमूने के रूप में यह
पठनीय है। यह साम्प्रदायिक आरक्षण के सिद्धान्त के अंतर्गत घटी कुछ काल्पनिक घटनाओं पर आधारित
है। चूंकि यह पत्रिका आसानी से उपलब्ध नहीं है, इसलिए मैं इन्हें नीचे उद्धृत करता हूँ -
‘भविष्य की एक झलक’ - निम्नलिखित उद्धरण आयोगों, पुलिस मामलों के न्यायालयों के आलेखों,
न्यायिक मुकदमों, परिषद की कार्रवाइयों, प्रशासन रिपोर्टों आदि से लिए गए हैं जो 1930-50 के वर्षों
के दौरान जारी हुए थे और विशिष्ट रूप से ‘गुजराती पंच’ के पाठकों के लिए प्रकाशित किए जाते
हैं।
1. भारत सरकार पर रॉयल कमीशन की रिपोर्ट, 1930 ः भारत के अनेक सम्प्रदायों की ओर
से प्राप्त अभ्यावेदनों पर हमने गम्भीरतापूर्वक विचार किया है। गत जनगणना के आंकड़ों को आधार
मानकर, हम अपने सम्मुख किए गए दावों को केवल यथासंभव संतुष्टि ही प्रदान कर सकते हैं क्योंकि
सरकारी तंत्र को निर्मित करने की समस्या का कोई विशुद्ध हल तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि
देश के प्रत्येक व्यक्ति को उसका सदस्य न बनाया जाए क्योंकि कई सम्प्रदायों की संख्याओं में सामान्य