विदेशियों से आग्रह
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पेरोडी लिखी। डॉ. आर.पी. परांजपे, जो ऑस्ट्रेलिया में नए हाई कमिशनर बना कर भेजे गए थे, उन्होंने पेरोडी लिखी थी। यह समझना कठिन है कि डॉ. परांजपे जैसे
परन्तु कानून के अनुसार आरोपी को सज़ा नहीं दी जा सकती, मृत्यु-दण्ड तो दूर की बात है, क्योंकि चालू वर्ष में सात तेली पहले ही सज़ा पा चुके हैं, जिनमें से दो को मृत्यु-दण्ड मिला है, और भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत अन्य कई सम्प्रदायों को अपनी सज़ाओं का कोटा नहीं मिला है जबकि तेलियों का कोटा पूरा हो चुका है। न्यायाधीश ने बचाव पक्ष के वकील की दलील स्वीकार कर ली तथा आरोपी को बरी कर दिया।
7. ‘इंडियन डेली मेल’ से उद्धरण, 1936ः अन्नाजी रामचन्द्र (चितपावन ब्राह्मण) को पूना की गलियों में एक लम्बे चाकू के साथ घूमते हुए और सामने आने वाले हर व्यक्ति पर हमला करते हुए पाया गया। जब उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया तो पुलिस ने बताया कि वह हाल ही में एक मानसिक अस्पताल से छूट कर आया है। अस्पताल के अधीक्षक ने अपने साक्ष्य में कहा कि अन्नाजी तीन वर्ष तक उनके अस्पताल में एक खतरनाक पागल के रूप में रहा था, परन्तु चूंकि चितपावनों के लिए एक कोटा निर्धारित था और अन्य सम्प्रदायों के अस्पताल-वासियों ने अपने वार्षिक कोटे पूरे नहीं किए थे, वह उसे और अधिक समय के लिए अस्पताल में नहीं रख सकते थे क्योंकि ऐसा करना चितपावनों के पक्ष में भेदभाव होता। इसलिए उन्होंने उसे चिकित्सा विभाग के भारत सरकार के आदेश संख्या........के अनुसरण में छोड़ दिया। मजिस्ट्रेट ने अन्नाजी को रिहा कर दिए जाने का आदेश दिया। 8. ‘बम्बई प्रेसीडेंसी में जेल प्रशासन पर रिपोर्ट’ से एक उद्धरण, 1937ः पूरी सावधानी बरतने के बाद भी, जेल के बन्दियों की संख्या प्रत्येक सम्प्रदाय के लिए निर्धारित कोटे के अनुपात में नहीं है। इस विसंगति को दूर करने के लिए जेल अधीक्षक ने भारत सरकार से निर्देश मांगे हैं। सरकार का संकल्पः जेलों के महानिरीक्षक की इस कर्तव्य-उपेक्षा पर सरकार अत्यंत अप्रसन्न है। जेल में विभिन्न सम्प्रदायों का कोटा पूरा करने के प्रयोजन से अधिक से अधिक संख्या में उक्त सम्प्रदायों के लोगों को पकड़ कर जेलों में बन्द करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिएं। यदि अपेक्षित संख्या में लोग नहीं पकड़े जा सकते तो सभी को समान स्तर पर लाने के लिए, पर्याप्त संख्या में बन्दियों को जेल से रिहा कर दिया जाना चाहिए।
9. विधान परिषद की कार्रवाई, 1940ः श्री चेन्नप्पा ने पूछाः क्या सरकार का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया गया है कि पाली की एम.ए. की हाल में हुई परीक्षा की कक्षा सूची में मंग-गरुड़ों का समुचित कोटा नहीं दर्शाया गया है?
माननीय श्री दामू श्रौफ (शिक्षा मंत्री)ः विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से प्राप्त सूचना के अनुसार, मंग-गरुड़ों के किसी उम्मीदवार ने परीक्षा नहीं दी।
श्री चेन्नप्पाः जब तक ऐसा उम्मीदवार परीक्षा देने न आए, क्या तब तक के लिए सरकार इस परीक्षा को स्थगित करेगी और विश्वविद्यालय द्वारा सरकार के आदेश की अवहेलना किए जाने पर क्या सरकार उसे अनुदान देना बन्द कर देगी और विश्वविद्यालय अधिनियम का संशोधन करेगी? माननीय मंत्रीः सरकार इस सुझाव पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी। (हर्ष ध्वनि) 10. ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से उद्धरण, 1942ः जे.जे. अस्पताल में एक ऑपरेशन के परिणामस्वरूप हुई रामजी सोनू की मृत्यु की जांच करने के लिए कोरोनर श्री.........को एकाएक बुलाया गया। डॉ. तानु पाण्डव (जाति नाई) ने बयान दिया कि उन्होंने ऑपरेशन किया था। वह पेट में एक फोड़े पर चीरा लगाना चाहते थे परन्तु उनका चाकू हृदय में घुस गया और मरीज़ की मृत्यु हो गई। यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने इस प्रकार का कोई ऑपरेशन पहले कभी किया है, उन्होंने कहा कि केवल एक दिन पूर्व ही उन्हें अस्पताल का मुख्य सर्जन नियुक्त किया गया था क्योंकि तब आरक्षण के फलस्वरूप उनके सम्प्रदाय की बारी आ गई थी, परन्तु उन्होंने इससे पहले कभी शेव करने के रेज़र के अतिरिक्त शल्य चिकित्सा औज़ार को हाथ भी नहीं लगाया था। जूरी ने अपने निर्णय में मृत्यु का कारण दुर्भाग्य बताया।