9. विदेशियों से आग्रह - Page 251

236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

गणमान्य व्यक्ति ने कैसे इस प्रकार के विचार लेख में शामिल किए। इस प्रकार के मिरासियों जैसे कटाक्ष और पेरोडी (इसे भंडेलापन कह सकते हैं) शैली अपना कर आभास कराया जा सकता है कि शोषित वर्गों के सदस्य यदि ऐसी मांगें करने के लिए निपट मूर्ख भी नहीं तो पथभ्रष्ट अवश्य हैं। शासक वर्गों के लोग शोषितों की उन मांगों का विरोध करते हुए इस बात का उपदेश देते हैं कि भारतीय परंपरागत निपुण नीति बनाए रखने के लिए शासन के प्रत्येक पद पर योग्यतम व्यक्तियों के अतिरिक्त और किसी को अवसर न दिए जाएं।

इस सिद्धांत पर किसी को कोई ऐतराज नहीं कि योग्यतम व्यक्ति की जगह उससे कम योग्य व्यक्ति को और साधारण योग्यता के व्यक्ति की जगह बिल्कुल अयोग्य व्यक्ति को न लगा दिया जाए। परंतु ऐसा तर्क भारतीय इतिहास की घटनाओं पर दृष्टिपात करने से पूर्णतया निरर्थक सिद्ध होता है, क्योंकि भारतीय इतिहास के अनुसार, जो योग्यतम व्यक्ति चुना जाता था, वह शासक वर्ग से ही संबंधित होता था। शासक वर्ग के विचार से यह सिद्धांत बहुत ठीक था। परन्तु क्या वह सिद्धांत शोषित वर्ग के दृष्टिकोण से ठीक कहा जा सकता है? क्या श्रेष्ठ जर्मन फ्रांसीसियों के लिए श्रेष्ठ हो सकता है? क्या श्रेष्ठ तुर्क यूनानियों के लिए श्रेष्ठ हो सकता है। क्या कोई पोलैंडवासी यहूदी के लिए श्रेष्ठ हो सकता है? इन प्रश्नों का सही उत्तर मिलने में संदेह है। जातीय या देसज योग्यता की उपेक्षा कभी नहीं की जा सकती। मनुष्य यंत्रवत नहीं है। वह मनुष्य है और मनुष्य होने के नाते कुछ के प्रति उसकी सहानुभूति है, तो कुछ के प्रति घृणा द्वेष होता है। यह तर्क सचमुच श्रेष्ठ व्यक्ति पर भी लागू होता है। उस पर जातीय सहानुभूति एवं वर्गीय द्वेषभाव करने का दोषारोपण किया जा सकता है। इन बातों पर ध्यान देने से प्रकट होता है कि शासक वर्ग से संबंधित श्रेष्ठ व्यक्ति शासित वर्गों के दृष्टिकोणों से बहुत निषिद्ध साबित होगा। शासक वर्ग और शासित वर्गों के दृष्टिकोणों में वही अंतर है, जैसा कि दो भिन्न राष्ट्रों में होता है। शासक वर्ग के लोग शासित वर्ग से मिरासीपन दिखाकर द्वेष प्रकट करते समय भूल जाते हैं कि भारत में शासक वर्ग और शासित वर्ग के बीच का अंतर ठीक वैसा ही है जैसा कि फ्रांसीसी और जर्मन का, तुर्की और यूनानियों का अथवा पोलैंड निवासियों और यहूदियों के बीच। इसका कारण वही है कि वे एक दूसरे का शासन बर्दाश्त नहीं कर सकते, चाहे शासन करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठतम ही क्यों न हो?

शासक वर्ग शोषितों की मांगों का विरोध करते समय यह भी भूल जाता है कि उसने सत्ता में आने के लिए कौन से साधन अपनाए थे। उन्हें स्वयं अपनी मनुस्मृति के पन्ने पलटने से पता चलेगा कि जिन हथकंडों से उन्हें सत्ता मिली है, वे ठीक वैसे ही हैं, जैसे कि डॉ. परांजपै ने अपने व्यंग्य लेख में लिखा है। मनुस्मृति के अध्ययन