विदेशियों से आग्रह
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से पता चलेगा कि ब्राह्मण जो शासक वर्ग का मुख्य तत्व है, उसने राजनीतिक शक्ति अपने बौद्धिक बल से ही प्राप्त नहीं की। बौद्धिकता किसी की बपौती नहीं। इन्होंने तो जातिवाद के आधार पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा। मनुस्मृति के विधान के अनुसार पुरोहित के पद, सम्राट के पुरोहित, पुजारी, लॉर्ड चांसलर उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति और न्यायाधीशों और सम्राट के मंत्रियों के पद ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित थे। यहां तक कि सेना के सेनापति के पद पर ब्राह्मण के होने के आदेश दिए गए थे चाहे वह अनुपयुक्त ही क्यों न हों? वे सभी ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित थे। ब्राह्मण अपने वर्ग के लिए लाभ और सत्ता संरक्षण से ही संतुष्ट नहीं थे। वे जानते थे कि केवल संरक्षण ही पर्याप्त नहीं है। गैर-ब्राह्मण जातियों में, ब्राह्मणों के समान योग्यता वाले लोगों द्वारा मुख्य पदों को प्राप्त करने और ब्राह्मणों के आरक्षण को उखाड़ फेंक देने वाले लोगों के आंदोलन की संभावनाओं को समाप्त करना भी ब्राह्मणों ने आवश्यक समझा। ब्राह्मणों ने समस्त अधिशासी पदों को अपने लिए आरक्षित करने के साथ-साथ शिक्षा पर ब्राह्मणों का एकाधिकार कायम रखने के लिए विधान बनाया। जैसा कि पहले ही संकेत दिया जा चुका है, ब्राह्मणों ने विधान बनाकर हिंदू समाज के निम्नतर वर्ग के लिए पढ़ाई-लिखाई अपराध घोषित कर दिया, जिसका उल्लंघन करने वाले को कठोर तथा अमानुषिक दंड, जैसे अपराधी की जीभ कटवा लेना और उसके कान में पिघलता हुआ सीसा डलवा देना, की व्यवस्था की गई। कांग्रेसी यह कह कर छुट्टठ्ठी नहीं पा सकते कि ऐसे दंड अब नहीं दिए जाते। उन्हें मानना होगा कि वैसे दंड अब नहीं दिए जाते, परंतु उन नियमों के अस्तित्व में रहने का शासक वर्ग अब भी लाभ उठा रहा है। ईमानदारी से कांग्रेसी लोग शासित वर्गों की मांग को सांप्रदायिक नहीं कह सकते क्योंकि वे जानते हैं कि ब्राह्मणों ने सत्ता हथियाने के लिए सबसे बुरी सांप्रदायिकता का सहारा लिया है। यदि आज शासित वर्ग के लोग अपने लिए संरक्षण मांगते हैं, तो उसका कारण यह है कि ब्राह्मण ने अपनी सुख-सुविधाओं को सुरक्षित रखने के लिए पहले ही से कानून बनाकर शासित वर्ग द्वारा विद्याध्ययन तथा संपत्ति संचय पर दंड का विधान कर दिया। वास्तव में शोषित वर्गों के लोग जिस संरक्षण की मांग कर रहे हैं, वह उसका आधा भी नहीं है, जितना कि ब्राह्मणों ने अपनी उन्नति और सुख-सुविधाओं को सुरक्षित रखने के लिए लिया है जिसके लिए उन्होंने काले कानून बनाए और दास वर्गों को आज तक पद-दलित बनाकर रखा है।
जो कुछ भी ऊपर कहा गया है, उसके संदर्भ में शासक वर्ग के नेतृत्व में, जो आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही है, शासित वर्गों के विचार में यह स्वार्थ है। शासक वर्ग भारत की जिस आजादी के नाम पर लड़ाई लड़ रहा है, उसका उद्देश्य विदेशियों से सत्ता छीनकर शासित दास वर्गों पर शासन करना है। शासक वर्ग स्वामियों का सेवकों