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विदेशियों से आग्रह

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हैं। वे संरक्षणों की मांग की परवाह किए बिना कांग्रेस का समर्थन करते हैं। तीसरी श्रेणी उन विदेशियों की है जो भारत भ्रमण के लिए आते हैं, जो रातों-रात यहां की राजनीति समझने का प्रयास करते हैं। ये तीनों ही श्रेणियां खतरनाक हैं। परंतु तीसरी श्रेणी भारतीय लोगों के हितों की दृष्टि से सबसे अधिक खतरनाक है।

जो विदेशी भारत भ्रमण करने के लिए आते हैं, वे भारतीय राजनीति की बारीकियों को नहीं समझ सकते। यह समझ में नहीं आता कि ये विदेशी कांग्रेस का समर्थन केवल उसी रास्ते पर चलकर क्यों करते हैं, जैसा कि मि. पिकविक ने सैमवेलर से कहा था कि ज्यादा से ज्यादा भीड़ इकट्टòी करके गला फाड़ो परंतु सबसे अधिक दुःखदायी वह रवैया है जो ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेताओं, यूरोप और अमरीका के क्रांतिकारी एवं वामपंथी वर्ग के प्रमुखों, जिनका प्रतिनिधित्व लास्की, किंग्सले मार्टिन और ब्रेल्सफोर्ड जैसे लोग करते हैं, और अमरीका के फ्नेशनय् और इंग्लैंड के फ्न्यू स्टेटसमेनय् जैसी पत्रिकाओं के संपादकों ने अपना रखा है, जो पददलित और पिछड़े लोगों के हिमायती माने जाते हैं। ये बात हमारी समझ में नहीं आती कि वे कैसे कांग्रेस का समर्थन करते हैं। क्या ये नहीं जानते कि भारत में कांग्रेस और शासक वर्ग एक ही थैली के चट्टठ्ठे-बट्टठ्ठे हैं। क्या वे नहीं जानते कि भारत में ब्राह्मण-बनिया गठबंधन शासन की धुरी है? कांग्रेस में ब्राह्मण और बनियों के अतिरिक्त जो बहुसंख्यक जनता कांग्रेस का झंडा थामती है, उसका कांग्रेस के नीतिनिर्धारण में कोई योगदान नहीं। क्या महान व्यक्तित्व वाले उपरोक्त विदेशी यह नहीं समझते कि जिन कारणों से सुल्तान इस्लाम को और पोप कैथोलिक धर्म को नहीं मिटा सके, शासक वर्ग वैसे ही इस मकड़-जाल को नहीं तोड़ेगा और ब्राह्मण की श्रेष्ठता पर चोट नहीं करेगा। तब तक ब्राह्मण और सहयोगी जातियों की श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जाता ही रहेगा। भारत की आजादी के बाद भी सरकार की वही पवित्र नीति जारी रहेगी जिससे शूद्रों और अस्पृश्यों का दमन और तिरस्कार होता है। क्या वे नहीं जानते कि भारत का शासक वर्ग देश का लोक मानस नहीं है। वह उनसे न केवल कटा हुआ है, बल्कि खुद भी उनसे ऐसे बचकर चलता है कि कहीं उसे छूत न लग जाए, क्योंकि ब्राह्मणों ने उल्लू की लकड़ी घुमा रखी है। उसका सोच और हित उनसे टकराते हैं, जो उनके समाज से बहिष्कृत हैं और उनकी दलितों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है, उनके मन में दलितों की आकांक्षाओं और दुःख-दर्द को समझने की संवेदना नहीं है, उन्हें शिक्षा, उच्च सरकारी रोजगार दिलाने का अहसास नहीं है और वे उनके सम्मान और स्वाभिमान जगाने वाले आंदोलनों का विरोध करते हैं। क्या वे नहीं जानते कि भारत को स्वराज्य मिल जाने के साथ उसमें 6 करोड़ अस्पृश्यों का भागय भी अंतर्निहित