9. विदेशियों से आग्रह - Page 257

242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है? यह कहना असंभव सा प्रतीत होता है कि ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता, किंग्सले मार्टिन, ब्रेल्सफोर्ड और लास्की जिनके स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के विषय में लेख सभी पिछड़े लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं, इन बातों को नहीं जानते। तब भी वे भारत के संदर्भ में जब कुछ कहते हैं तो कांग्रेस का ही समर्थन करते हैं। वे शायद ही कभी अस्पृश्यों की समस्या पर मुंह खोलते हों, जिस पर सभी प्रगतिवादियों और प्रजातंत्रवादियों का ध्यान जाना चाहिए था। इन विचारों द्वारा केवल कांग्रेस कार्यकलापों पर ध्यान जाना, भारत के राष्ट्रीय जीवन के अन्य तत्वों की उपेक्षा करना, इस बात को स्पष्ट करता है कि उन्हें गुमराह किया गया है। यदि कांग्रेस राजनीतिक प्रजातंत्र के लिए लड़ाई लड़ती होती, तो कांग्रेस को समर्थन देने की बात समझ में आ सकती थी परंतु क्या ऐसा है? सब जानते हैं कि कांग्रेस केवल राष्ट्रीय आज़ादी की लड़ाई लड़ रही है और राजनीतिक प्रजातंत्र में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह पार्टी जो भारत में राजनैतिक प्रजातंत्र की लड़ाई लड़ रही है, वह केवल अस्पृश्यों की पार्टी है, जिसे आशंका है कि कांग्रेस की आजादी की यह लड़ाई यदि कामयाब हो जाती है, तो इसका अर्थ होगा कि शक्तिशाली वर्ग को ही स्वतंत्रता मिलेगी और वह अधिक शक्ति के साथ कमजोरों और दलितों को तब तक दबाएगा, जब तक कि उनकी सुरक्षा के लिए संवैधानिक संरक्षण न दे दिया जाए। यह वही दलित वर्ग है, जिसे उन प्रगतिशील नेताओं की सहायता की आवश्यकता है। परंतु उनकी सहानुभूति एवं समर्थन की वर्षों से प्रतीक्षा अस्पृश्यों के लिए व्यर्थ साबित हुई। यूरोप और अमरीका के उन प्रगतिशील एवं वामपंथी नेताओं ने यह जानने की परवाह नहीं की कि कांग्रेस के पीछे कौन शक्ति काम कर रही है। अनभिज्ञ और लापरवाह व्यक्ति भले ही कांग्रेस की भावना को न जानता हो, परंतु वास्तविकता यह है कि वे वामपंथी और प्रगतिशील नेता आंख मूंद कर उस कांग्रेस का समर्थन करते हैं, जो पूंजीपतियों, जमींदारों, सूदखोरों तथा प्रतिक्रियावादियों द्वारा चलाई जा रही है - केवल इसीलिए कि कांग्रेस अपने कार्यकलापों को स्वतंत्रता संग्राम का गौरवपूर्ण नाम देती है। स्वतंत्रता की सभी लड़ाइयां समान नैतिक स्तर की कमी हुआ करती, क्योंकि स्वतंत्रता की इन लड़ाइयों का सदैव एक सा ध्येय नहीं हुआ करता। इंग्लैंड के इतिहास से कुछ उदाहरण लीजिए। जॉन के विरुद्ध बेरन का विद्रोह आजादी की लड़ाई कहा जा सकता है, परंतु क्या कोई लोकतंत्रवादी आज के युग में उसका समर्थन कर सकता है? क्या केवल इसलिए इंग्लैंड के किसान विद्रोह का समर्थन किया जा सकता है कि उसे स्वतंत्रता का नाम दे दिया गया था। ऐसा करना स्वतंत्रता के नाम पर उठाई गई झूठी आवाज पर आगे बढ़ने के समान होगा। ऐसा अपरिपक्व व्यवहार क्षम्य होता, यदि वह किसी ऐसे मंद बुद्धि व्यक्ति द्वारा प्रकट किया जाता, जिसे यह निर्णय करना न आता