विदेशियों से आग्रह
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हो कि जीने की स्वतंत्रता और दमन करने की स्वतंत्रता में क्या भेद है? परंतु सर्वश्री लास्की, किंग्सले मार्टिन, बेल्सफोर्ड, लुई फिशर जैसे लब्धप्रतिष्ठित प्रजातंत्र-संरक्षकों के प्रगतिशील वामपंथी अनुयायियों को इसके लिए क्षमा नहीं किया जा सकता।
जब उनसे यह प्रश्न पूछा जाता है कि वास्तविक प्रजातंत्र के लिए लड़ने वाली पार्टियों का समर्थन क्यों नहीं करते, तो वे पलट कर प्रश्न करते हैं कि क्या भारत में अन्य ऐसी पार्टियां हैं जो वास्तविक प्रजातंत्र के लिए लड़ रही हैं? यदि ऐसी पार्टियां हैं तो समाचार पत्र वाले उनके कार्यकलाप क्यों नहीं प्रकाशित करते? जब यह कहा जाता है कि प्रेस कांग्रेस का है, तब पुनः प्रश्न उठता है कि विदेशी अंग्रेजी समाचार पत्रों वाले क्यों नहीं प्रकाशित करते? मै।ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी समाचार पत्रों वालों से कोई आशा नहीं की जा सकती। भारत में जो विदेशी समाचार एजेंसियां हैं वे भारतीय समाचार एजेंसियों से अधिक नहीं कही जा सकतीं। वास्तव में वे अधिक अच्छी एजेंसियां हो भी नहीं सकतीं। भारत में विदेशी पत्रकारों के रूप में जिन भारतीयों का चुनाव किया जाता है, वे अधिकतर कांग्रेस के पिट्ठू होते हैं। वे विदेशी पत्रकार, जो विदेशी ही होते हैं दो प्रकार के होते हैं। यदि वे अमरीकी हैं, तो अंग्रेजों के बिल्कुल विरुद्ध हैं तथा कांग्रेस के पक्ष में हैं। भारत में जो राजनीतिक पार्टी पागलों की तरह अंग्रेजों का विरोध नहीं करती, उसके प्रति उनको कोई दिलचस्पी नहीं होती। वे लोग जो कांग्रेस में नहीं हैं, इस बात के गवाह हैं कि वर्ष 1941-42 में भारत आए अमरीकी पत्रकारों को समझाना कितना कठिन था कि कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं है, परन्तु उन्होंने दूसरी पार्टियों को घास नहीं डाली। उन्हें बहुत समय के बाद अनुभव हुआ, तब उन्होंने या तो कांग्रेस को गलत सिद्धांतों वाली संस्था कह कर उसकी निंदा की अथवा भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेना ही बंद कर दिया। उन्होंने भारत की अन्य राजनीतिक पार्टियों में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई और न कभी उनके विचारों को समझने की चिंता की। अंग्रेज संवाददाताओं का भी यही हाल है। वे भी केवल इस प्रकार की राजनीति में रुचि लेते हैं, जो घोर ब्रिटेन-विरोधी हैं। वे उन पार्टियों को नहीं पूछते, जो सुरक्षित लोकतंत्र की हामी हैं जिसके परिणामस्वरूप विदेशी पत्रकार भारतीय राजनीति के संबंध में उसी प्रकार के समाचार प्रकाशित करते हैं जिस प्रकार के भारतीय समाचार पत्र करते हैं। चाहे वे पत्रकार हों या न हों, क्या उन प्रगतिशील विचारकों का यह कर्तव्य नहीं हो जाता कि संसार के किसी भी भाग में, जहां कहीं सही प्रजातंत्र के लिए लड़ाई लड़ी जा रही हो, वे अपने विचारों के अनुकूल तत्वों को प्रोत्साहित करें, उनसे संपर्क कायम रखें और देखें कि सब जगह प्रजातंत्र का प्रसार हो। दुर्भाग्य की बात है कि अमरीकी और इंग्लैंड के प्रगतिशील