1. अनोखी घटना - Page 26

अनोखी घटना

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वर्ष 1895 में जब कांग्रेस का अधिवेशन पूना में हुआ था तब श्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कांग्रेस के अध्यक्ष के नाते अधिवेशन की अध्यक्षता की और इस विषय पर चर्चा की थी। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा µ

फ्हम अपने खेमें में फूट नहीं पड़ने देंगे। कुछ लोग पहले से ही कह रहे थे कि यह हिंदू कांग्रेस है यद्यपि हमारे मुसलमान मित्रों की उपस्थिति से इस वक्तव्य का खंडन हो गया है। कांग्रेस किसी एक समाज की पार्टी नहीं वरन् सब की पार्टी है। यह कांग्रेस हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और सिखों की संयुक्त संस्था है। वे लोग अपने-अपने सामाजिक रीति-रिवाजों में सुधार करें या न करें यह उन्हीं पर निर्भर करता है। यहां हम सभी लोग एक समान मंच पर आकर अपने सामाजिक और धार्मिक मतभेदों को भुलाकर केवल सार्वभौम विषय पर और एक ही सरकार के अधीन रहते हुए केवल समान कठिनाइयों के निराकरण, समान अधिकारों को प्राप्त करने के लिए ही कांग्रेस मंच का उपयोग करेंगे। कांग्रेस हमारी राजनैतिक संस्था है। हमने कांग्रेस का गठन अपने अधिकारों के संरक्षण और विस्तार के लिए तथा अपनी कठिनाइयों का समाधान करने के लिए किया है। डॉक्टरों का यह संकाय जो विज्ञान में प्रमुख स्थान रखता है और वे भी इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि वे अपनी लड़कियों का बचपन में विवाह न करेंगे तथा अपनी विधवा पुत्रियों का पुनर्विवाह करेंगे या नहीं करेंगे। हमारी कांग्रेस केवल राजनैतिक संस्था है, सामाजिक सुधार की संस्था नहीं। अतः यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि कांग्रेस हमारी सामाजिक संस्था नहीं है यह आरोप इसी प्रकार का है जैसे किसी वकील से कहा जाए कि वह डॉक्टरी क्यों नहीं जानता। राजनैतिक मामलों में भी अल्पसंख्यकों के विचारों का हम आदर करते हैं जैसा कि इसके पहले 1887 में श्री बदरूद्दीन तैयब जी के विचार थे जो एक बार कांग्रेस अध्यक्ष भी बने थे और जिनकी बंबई उच्च न्यायालय की न्यायपीठ में पदोन्नति राष्ट्रीय अभिनंदन का विषय है, और इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि जहां एक वर्ग में व्यावहारिक सर्वसम्मति हो यद्यपि वह वर्ग कांग्रेस में अल्पसंख्यक वर्ग है, लेकिन उनके सामाजिक विवादों पर कांग्रेस में चर्चा नहीं की जानी चाहिए और उस पर रोक लगा देनी चाहिए।

हमारी जैसी संस्था के लिए यह विशेष खतरा है - विशेषकर उनसे जो उन्नत तथा विकसित समाज के हैं और अपने में झगड़े के बीच समाहित किए हुए हैं। हमें उनसे अपनी संस्था की रक्षा करनी है।’’